‘जी रये, जागि रये, धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये।
सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो, दूब जस फलिये
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये।

हरेला उत्तराखंड में कुमाऊं मंडल का मूल पर्व है, लेकिन प्रकृति और आस्था से जुड़े पर्व हरेला को लेकर द्रोणनगरी में भी उत्साह चरम पर है। पिछले बुधवार को यहां हरेला बोया गया ता, जिसे शुक्रवार सुबह पंडित जी की मौजूदगी में काटा जा रहा है। पिछले 8-10 दिनों से हरेला के अच्छे उत्पादन के लिए इसमें सुबह-शाम पानी दिया गया। क्योंकि, हरेला जितना बड़ा होगा, फसल भी उतनी ही अच्छी होगी। हरेला को मंगलकारी माना जाता है।

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हरेला का मतलब हरियाली से है और यह पर्व देशभर में चैत्र, श्रावण और अश्र्विन महीनों में मनाया जाता है। मूल रूप से यह पर्व नई ऋतु के आगमन की सूचना देता है। लेकिन, उत्तराखंड में श्रावण माह में हरेला हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

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पिछले बुधवार को लोगों ने थालीनुमा पात्र या टोकरी में मिट्टी डालकर उसमें गेहूं, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि के सात या पांच प्रचार के बीजों को बोए थे। अब दस दिन बाद शुक्रवार सुबह महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सजकर हरेले को काटेंगी और फिर परंपरानुसार पूजा-अर्चना होगी।

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इसके बाद घर की बुजुर्ग महिलाएं सभी सदस्यों को हरेला लगाएंगी। हरेला लगाने की शुरुआत पैरों से होती है और सबसे अंत में सिर पर लगाया जाता है। हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि फसलों को कोई नुकसान न हो। हरेला का अर्थ हरियाली से है।

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केंद्रीय कूर्मांचल परिषद के महासचिव चंद्रशेखर जोशी बताते हैं कि हरेला पर्व हमें नई ऋतु के शुरू होने की सूचना भी देता है। हरेला पर्व पर भगवान शिव की मूर्ति गढ़ना भी मंगलकारी होता है।