ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहे हैं, जिससे उत्तराखंड में नदियों ने लिया विकराल रूप 

ग्लोबल वार्मिंग कहें या कुछ और लेकिन ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहे हैं और ग्लेशियरों के पीछे खिसकने से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की नदियों ने इन दिनों विकराल रूप धारण किया हुआ है। नदियों के दोनों किनारों पर कटान लगातार बढ़ रहा है। इससे नदी किनारे के दोनों तरफ के पहाड़ों में भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है। पिछले कुछ दिनों से लगातार हो रही तेज बारिश में यह खतरा और भी बढ़ गया है।

 

जियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) ने अपने सर्वेक्षण के आधार चेतावनी दी है कि तेज बारिश के कारण यह खतरा काफी ज्यादा बढ़ गया है। गौरतलब है कि जीएसआई पहले ही चेतावनी दे चुका है कि हिमालयी क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन के असर से ग्लेशियरों के मिजाज में बदलाव आया है।

 

इसकी वजह से नदियों की गतिविधियों में भी परिवर्तन आ रहा है। नदियों में पानी बढ़ेगा और वे तेजी से अपने रास्ते भी बदल सकती हैं। भूगर्भ के अंदर चल रही ‘टेक्टोनिक’ गतिविधियां, ऊंचा उठता हिमालय और पीछे खिसकते ग्लेशियर एक हिमालयी क्षेत्र के वातावरण के लिए एक खतरनाक त्रिक्रोण बना रहे हैं।

 

जियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया देहरादून के निदेशक डॉ. वीके शर्मा की मुंबई से निकलने वाले इंडियन साइंस कॉंग्रेस जर्नल में इसी साल छपी रिपोर्ट में इस बाबत आगाह किया गया है।

 

इसमें कहा गया है कि इंडियन प्लेट के यूरेशियन प्लेट की टकराहट की जो गतिविधि चल रही उससे भूस्खलन और बढ़ेंगे। कटान के कारण नदी के दोनों तरफ के पहाड़ों में भूस्खलन अन्य स्थानों की बनिस्पत ज्यादा हो सकते हैं।

 

विज्ञानिकों का कहना है कि देश की अधिकांश नदियां इन्हीं ग्लेशियरों से से निकलती हैं। ग्लेशियरों के पीछे खिसकने की वजह नदियों में पानी की मात्रा और ज्यादा बढ़ जाएगी। इस पानी को पहाड़ भी सोखेगा और नदियों में बहाव तेज हो जाएगा जो कटान पैदा करेगा।

 

भूगर्भ विज्ञानियों को आशंका है कि तेज बारिश में मिट्टी की नमी के कारण उन स्थानों पर भूस्खलन हो सकता है जहां भारी चट्टानें हैं और ढलान अधिक है।