उत्तराखंड में भूस्खलन के लिए संवेदनशील घोषित 354 गांवों में हजारों परिवार खतरे में जी रहे हैं। बरसात में इन गांवों में हमेशा खतरा मंडराया रहता है। इनमें से 129 गांवों का अब तक भूगर्भीय सर्वे तक नहीं हो पाया है।

राज्य में साल 2010 से पहले संवेदनशील गांवों की संख्या 233 थी। अब यह संख्या 356 हो गई है। विस्थापन नीति तैयार होने के छह सालों में सिर्फ दो ही गांवों को विस्थापित किया जा सका है। इनमें रुद्रप्रयाग जिले का छातीखाल और चमोली जिले का फाकड़े गांव शामिल है। भूस्खलन से संवेदनशील 129 गांव ऐसे हैं जिनका अब तक भूगर्भीय सर्वेक्षण तक नहीं हो पाया है।

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आपदा न्यूनीकरण केंद्र (Disaster Reduction Center) के अनुसार भूस्खलन की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदशनील 129 गांव अकेले कुमांऊ अंचल के पिथौरागढ़ जिले में ही हैं। चमोली जिले में 61, बागेश्वर में 42, टिहरी में 36, रुद्रप्रयाग में 14, चंपावत में 10, अल्मोड़ा में 9, उत्तरकाशी में 8, नैनीताल में 6, देहरादून में 2 और ऊधम सिंह नगर में एक है।

पौड़ी जिले में 26 गांव भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है। जबकि पौड़ी जिला प्रशासन के रिकॉर्ड में इनकी संख्या 38 बतायी गई हैं। उप सचिव आपदा प्रबंधन उत्तराखंड, संतोष बड़ोनी का कहना है कि भूस्खलन से संवेदनशील गांवों का भू-सर्वेक्षण कराया जा रहा है। 225 गांवों का भू-सर्वेक्षण किया जा चुका है।