‘पहाडी कोचिगं’ : कुमाऊंनी भाषा सीखने का आसान और बेहद रोचक तरीका

सर्दी जुखाम को ‘ठन’ कहते और बर्तनों को ‘भान’ ।
पिस्सू को कहते ‘उपन’ और छोटे बच्चों को ‘नान’ ।।

साथ को कहते हैं ‘दगड’, और फाइटिंग को ‘झगड़’ ।
मोटे को तो ‘तगड़’ कहते और मलने को कहें ‘रगड़’ ।।

शीशे को यहां ‘कांच’ कहते ,सच्चे को कहें ‘सांच’ ।
नृत्य को कहते ‘नांच’ तो बंजर को कहैं ‘बांज’ ।।

छोटा भाई यहां ‘भुल’ ठैरा, तो किचन को बोलते ‘चुल’।
ब्रिज को कहते ‘पुल’ यहां और नहर को बोलते ‘कुल’।।

पत्नी ठहरी ‘सैणि’ यहां, तो बहिन कहलाती ‘बैणि’।
बहू हमारी ‘दुलैणि’ होती, ब्याई भैंस है ‘लैणि’।।

आदमी हमारा ‘मैंस’ ठहरा और रुपया ठैरा ‘पैंस’।
मौसी ‘कैंज’ कहलाती है, तो बफैलो है ‘भैंस’।।

जीजाजी हमारे ‘भिन’ होते और सख्त आदमी ‘जिन’।
गजक को यहां ‘पिन’ कहते और अंटौल को ‘किन’ ।।

चावल को यहां ‘भात’ बोलते और शादी को ‘बारात’
बड़ी थाली को कहें ‘परात’ और पित्र तर्पण को ‘श्राद्ध’।।

अपनी अपनी बोली भाषा, सबको लगती प्‍यारी।
कुमाउंनी बोली बोलन की, प्रभो आप करें तैयारी।।

सादर,
महेश चंद्र पपनै