अभिशाप बन चुके चीड़ और सूअर से इस तरह पार पाएगा उत्तराखंड

चीड़ और सूअर उत्तराखंड के लिए अभिशाप बन गए हैं। एक और चीड़ के पेड़ अपने आसपास दूसरी वनस्पतियों को पनपने नहीं देता और भूस्खलन का कारण बन रहा है तो दूसरी ओर सूअर खेतों में कुछ नहीं रहने देते। सूअर सारी फसल को नष्ट करके किसानों की पूरी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। नदियों में गाद या बालू भी राज्य में लगातार आ रही प्रलयकारी बाढ़ का कारण बन रही है।

उत्तराखंड सरकार ने अब इन तीनों से ही मुक्ति पाने का रास्ता खोजने की पहल शुरू कर दी है। राज्य के वन मंत्री दिनेश अग्रवाल ने समीक्षा बैठक कर 15 दिन के भीतर इसके लिए प्लान तैयार कर केंद्र को भेजने के निर्देश दिए हैं।

सोमवार को विधानभवन में आयोजित समीक्षा बैठक में वन मंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री हरीश रावत के निर्देशों की कड़ी में तीनों प्रकरणों के ठोस प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे जाने हैं। उन्होंने बताया कि चीड़ के जंगलों की वजह से राज्य को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है।

जंगली सूअर और नीलगाय की वजह से फसलों को नुकसान होता है और किसानों की सारी मेहनत उजड़ जाती है। नदियों में जमा सिल्ट या गाद के कारण आसपास के इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। जिससे जानमाल का भी काफी नुकसान होता है।

तीनों मामलों में मुख्यमंत्री हरीश रावत दो जुलाई को केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास मंत्री उमा भारती और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से पहले दौर की बात कर चुके हैं। उन्होंने इस कड़ी में प्लान तैयार करने को एक समिति का गठन किया है।

समिति में मुख्य वन संरक्षक गंभीर सिंह, मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं राजेंद्र सिंह बिष्ट और अपर सचिव वन एवं पर्यावरण मीनाक्षी जोशी और वन संरक्षक मनोज चंद्रन को नामित किया गया है। यह समिति आरक्षित वन और सिविल वनों के लिए दो अलग-अलग प्रस्ताव तैयार करेगी।

15 दिन में प्रस्ताव तैयार होने के बाद मुख्य वन्य जंतु प्रतिपालक की अध्यक्षता में गठित कमेटी इसे ठोस रूप देने के बाद केंद्र सरकार को भेजे देगी।