जब से इस संसार की उत्पत्ति हुई है तभी से कर्म को मानव का धर्म माना गया है। हम सभी लोग कर्म करने में विश्वास करते हैं। हम जीवन में सभी कर्म करते हैं। कर्म विहीन जीवन अपना अर्थ ही खो देता है।

समृद्ध परिवार में जन्म लेने में व्यक्ति का क्या कर्म़
अब प्रश्न यह है कि भाग्य या किस्मत क्या है। जब हम कर्म करते हैं तो कर्म के अनुरूप हमें प्रतिफल प्राप्त होता है। फिर भाग्य या किस्मत का क्या रोल है। भाग्य या किस्मत का अस्तित्व है या यह केवल एक मानवीय सोच है। यही विषय कालान्तर से चर्चा एवं बहस का बिन्दु रहा है।

कर्म एवं भाग्य परस्पर एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। आप अपने व्यवहारिक जीवन में देखेंगे कि कई बार कर्म एवं भाग्य साथ-साथ चलते हैं एवं कई बार कर्म एवं भाग्य विपरीत दिशा में चलते हैं। इसी के परिणाम स्वरूप आप पाएंगे कि समाज में कुछ व्यक्तियों ने बहुत मेहनत की परन्तु उन्हें सफलता के वह आयाम प्राप्त नहीं हुए जो कि इतनी मेहनत के उपरांत मिलने चाहिए थे। जबकि इसके विपरीत आपने यह भी देखा होगा कि कुछ व्यक्तियों द्वारा सामान्य कर्म या मेहनत की गई परन्तु उन्हें इसके प्रतिफल स्वरूप सफलता आशाओं से बहुत अधिक प्राप्त हुई।

जो लोग आस्तिक हैं अर्थात जिनका मत है कि संसार में भगवान/ईश्वर उपस्थित है एवं वही परम पिता परमात्मा इस सम्पूर्ण जगत को चलाता है एवं इस सम्पूर्ण सृष्टि पर उसी का नियंत्रण है। वह इस बात में विश्वास करते हैं कि जीवन में जो भी अच्छा या बुरा घटित होता है, वह उसके भाग्य या किस्मत में पहले से ही लिखा होता है। यदि हम यह मानें तो कर्म का क्या महत्व है जब जीवन में वह घटित होना ही है तो कर्म का क्या रोल है। कर्म, प्रतिफल, भाग्य यह सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

यदि आप धीरू भाई अम्बानी का उदाहरण लें तो पाएंगे कि धीरू भाई अम्बानी एक बहुत ही साधारण परिवार में पैदा हुए एवं अपने जीवन में संघर्ष एवं अति कठोर परिश्रम कर कर्मों एवं उत्तम भाग्य के सांम्जस्य से न केवल भारतवर्ष बल्कि अन्तराष्ट्रीय स्तर के व्यवसायी बन गए। धीरू भाई अम्बानी के दो बेटे हुए जो कि अपने जन्म से ही अत्यन्त समृद्धि एवं धन के मालिक बन गए अब प्रश्न यह उठता है कि उनके द्वारा तो कोई कर्म किए नहीं गए तो वह जन्मजात इतने धनवान कैसे बन गए। यह किस्मत या भाग्य का ही प्रभाव है।

आप देखेंगे कि जो बच्चे जुड़वा पैदा हुए हैं वह एक ही नक्षत्र एवं ग्रहों में पैदा होते हैं परन्तु दोनों का जीवन अलग अलग होता है। उनका शरीर, सोच, शिक्षा एवं जीवन शैली सर्वथा भिन्न-भिन्न होती है। उनमें से एक बहुत सफल एवं समृद्ध बन जाता है तो दूसरे का जीवन संघर्ष में ही बीत जाता है।

कुछ लोगों के लिए सफलता उनके द्वारा सीमित कर्मों या मेहनत के उपरांत ही कदम चूमती है, तो कुछ लोगों के लिए कड़ी मेहनत एवं परिश्रम के बाद में असफलता ही हाथ लगती है एवं उनका पूरा जीवन संघर्ष में ही बीतता है। तो यही कहा जा सकता है कुछ लोगों को सफलता भाग्य में ही लिखी होती है।

हमारे जीवन में अच्छा समय भी आता है एवं जीवन में बुरा समय भी आता है। यदि समय अच्छा है तो कम कर्म में परिणाम उत्तम मिलते हैं एवं जब समय बुरा आता है तो अधिक एवं कठोर कर्म करने के उपरांत भी प्रतिफल कम प्राप्त होता है। लेकिन यह अवश्य है कि कर्मों का फल मिलता जरूर है। इसके विपरीत यदि आप यह मानें कि मेरे भाग्य में लिखा होगा तो सफलता मिल जाएगी और कर्म ही न करें तो यह भी असम्भव है। कर्म एवं भाग्य एक दूसरे के पूरक हैं।

जीवन में कर्म और किस्मत में ज्योतिष की भूमिका
हां ज्योतिष इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है यदि आप अपने कर्मों को ज्योतिष जो कि एक सर्व स्वीकार्य विज्ञान है की मदद से सही समय पर एवं सही दिशा में सम्पादित करें तो निष्चित रूप से बेहतर प्रतिफल प्राप्त हो सकते हैं। ज्योतिष से आप अपने लिए अनुकूल क्षेत्र का चयन कर सकते हैं एवं यह भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि आपके लिए अनुकूल समय क्या है। यदि इन दोनों बिन्दुओं की जानकारी के अनुसार आप अपने कर्म करते हैं तो आपको बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे।

सामान्यतः लोग यह कहते हुए मिल जाएंगे कि भाग्य का लिखा हुआ कभी नहीं मिटता है एवं अवश्य घटित होता है। यह सत्य है परन्तु ज्योतिष के माध्यम से जो विषमताएं एवं कठिनाईयों का हमें सामना करना है उसकी तीव्रता में निष्चित रूप से कमी लायी जा सकती है। दूसरी ओर ज्योतिष के माध्यम से सकारात्मकता की तीव्रता को भी बढाया जा सकता है। ताकि यह सन्तुलित होकर जीवन सही प्रकार चलता रहे।

हमारे साथ जो भी बुरा घटित होता है उसके लिए तो हम कुछ मेहनत नहीं करते, फिर वह क्यों घटित हो जाता है। उदाहरण के लिए

यदि किसी व्यक्ति का एक्सीडेंट हो जाता है एवं जख्मी हो जाता है तो एक्सीडेंट एवं जख्मी होने के लिए तो कोई भी व्यक्ति कर्म नहीं करता है फिर कर्म के अभाव में एक्सीडेंट कैसे हो गया। ऐसा केवल ग्रहों की चाल के अनुसार होता है।

ज्योतिष की मदद से जीवन के बुरे समय के प्रभाव में कमी
यदि हम ज्योतिष विज्ञान की मदद से ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थिति का आंकलन कर अपने कर्म व्यवस्थित करते तो निश्चित रूप से एक्सीडेंट से बचाव सम्भव था, यदि बचाव सम्भव न होता तो इसकी तीव्रता को तो अवश्य ही कम किया जा सकता था।

ऐसा नहीं है कि जो लोग भाग्यशाली हैं या जिनकी किस्मत अच्छी है उन्हें कठिनाइयों या विषम परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता। यह अवश्य है भाग्यशाली होने के कारण विषमताओं की तीव्रता बहुत कम होगी जो कि उनके जीवन को अधिक प्रभावित नहीं करती।

इसकी दूसरी ओर जिनका भाग्य साथ नहीं दे रहा है वह जो पहले से ही संघर्षरत हैं, उनके जीवन में प्रतिकूल समय आने पर इसकी तीव्रता और बढ जाती है जिससे जीवन में अत्यन्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति को आवश्यकता है कि वह धैर्य रखें एवं ज्योतिष की सहायता से सुधारात्मक उपायों को करते हुए इसकी प्रतिकूलता की तीव्रता को कम करें। जिससे जीवन में अधिक कठिनाईयां न आएं।

यह लेख नरेश सिंगल से बातचीत के आधार पर लिखा गया है।

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नरेश सिंगल के बारे में

नरेश सिंगल देश के मशहूर वास्तु विशेषज्ञ हैं। उन्हें वास्तु विशारद और वास्तुशिल्प से भी नवाजा गया है। वास्तु विशेषज्ञ- नरेश सिंगल का जन्म भी इसी तारीख यानी 13 अगस्त, 1967 को हुआ था, जिसने इस तारीख को विशेष बना दिया। विशेष इसलिए कि वास्तु जैसे पुरातन विषय को आधुनिक पहचान देने में नरेश सिंगल का नाम अग्रणीय है। बात भारत की हो या किसी अन्य देश की, वास्तु पर सेमीनार एवं कार्यशाला आयोजित कर लोगों को जागरूक करने और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का जो कार्य नरेश सिंगल ने किया है, वो किसी अन्य ने नहीं। यही वजह है कि आज इनका नाम वास्तु और फेंग्शुई जैसे विषयों का पर्यायवाची स्वरूप बन गया है।

ग्रेजुएशन एवं इंटीरियर डिजाइनिंग की पढाई करने के बाद नरेश सिंगल ने वास्तु, फेंग्शुई और पिरामिडोलॉजी जैसे विषयों पर रिसर्च कार्य आरंभ किया। उन्होंने न सिर्फ इस सत्य को आत्मसात किया, बल्कि स्थापित भी किया कि वास्तु, फेंग्शुई एवं पिरामिडोलॉजी मनगढंत नहीं, बल्कि तार्किक हैं, ये महज अनुमान नहीं, विज्ञान हैं। ऐसा विज्ञान, जिसकी जानकारी इंसान के जीवन में उसी तरह चमत्कारिक परिवर्तन ला सकती है, जिस तरह बिजली व इंटरनेट के आविष्कार।
नरेश सिंगल के लेख व साक्षात्कार अग्रणी समाचार-पत्र, पत्रिकाओं में चाव से पढे जाते हैं। विभिन्न टेलीविजन चैनल भी समय-समय पर वास्तु, फेंग्शुई एवं पिरामिडोलॉजी पर उनकी राय लेते हैं।

‘वास्तु श्री’, ‘वास्तु विशारद (गोल्ड मेडलिस्ट) और भी न जाने कितने अलंकर्ण, कितनी उपाधियों से सुशोभित हैं सिंगल। इंस्टीट्‌युट ऑफ वैदिक वास्तु विजन के संस्थापक भी हैं सिंगल, जहां सैकडों छात्र-छात्राएं वास्तु, फेंग्शुई, पिरामिडोलॉजी की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।