खतरे में पहाड़ : हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ रही हैं भूस्खलन की घटनाएं

भारतीय और यूरेशियन प्लेट (अंगारालैंड और गोंडवाना लैंड) के टकराने के कारण ही टेथिस सागर की जगह पर महान पर्वत श्रृंखला हिमालय का निर्माण हुआ था। आज भी इन दोनों प्लेटों के टकराने से हिमालय लगातार ऊंचा हो रहा है, लेकिन इससे समूचे हिमालयी क्षेत्र में हलचल मची हुई है।

यहां भूस्खलन की घटनाएं काफी बढ़ गई हैं। जियोलोजिकल सर्वे आफ इंडिया (जीएसआई) की ताजा सेटेलाइट इमेजरी सर्वे रिपोर्ट आने के बाद यह तथ्य उजागर हुआ है। इस पर जीएसआई ने इन क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए नया रोड मैप तैयार करना शुरू कर दिया है।

जीएसआई ने रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा बताए गए चुनिंदा 25 जगहों की चट्टानों और मिट्टी की जांच शुरू कर दी है। यहां इंक्लोनोमीटर लगाए जाएंगे, जिससे पहाड़ों के अंदर की हलचल को पहले ही भांप लिया जाएगा। जीएसआई की एक दर्जन टीमों ने हिमालयी क्षेत्र का अलग-अलग मानचित्रण किया है।

इसमें पाया गया कि जब से इंडियन और यूरेशियन प्लेट में टकरावट शुरू हुई तो दबाव से हिमालय ऊंचा उठने लगा लेकिन इसके प्रभाव से हिमालयी रेंज में हर तरफ भूस्खलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। अब उन क्षेत्रों में भी भूस्खलन हो रहा है जहां ऐसी घटनाएं कम होती हैं। सर्वे विज्ञानियों का कहना है कि हिमालय ऊंचा होने के दबाव से पर्वतमालाओं के अंदरूनी हिस्सों में दबाव बढ़ गया है जिससे मिट्टी की परतें खिसक रही हैं।

प्लेटों के टकराने से जलवायु पर भी असर आ रहा है। ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं। इसने हिमालयी रेंज में भूस्खलन की प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। जीएसआई ने रक्षा मंत्रालय के साथ भूस्खलन के मामले में काम तेज कर दिया है।

इंक्लोनोमीटर लगाने के लिए मसूरी, नरेंद्र नगर और शेर का डांडा, नैनीताल का नाम तय किया गया है। इसके अलावा सर्वे ऑफ इंडिया के बताए 22 अन्य स्थानों पर बारिश, चट्टानों और मिटटी के प्रकार की जांच की जा रही है। रिपोर्ट आने के बाद इन जगहों का नाम फाइनल किया जाएगा।

विज्ञानिकों का कहना है कि भूस्खलन में डेढ़-दो घंटे से लेकर दो-तीन दिन तक का समय लग जाता है। इंक्लोनोमीटर 30 मीटर का होगा। इसे मिट्टी में डाल दिया जाएगा। एक-एक मीटर पर तीन सेंसर लगेंगे।

मिट्टी की परतों पर जैसे ही हलचल होगी सेंसर अलर्ट कर देगा। इसके बाद शासन-प्रशासन और लोकल अथॉरिटी को भी अलर्ट चला जाएगा। भूस्खलन के पहले ही बचाव कार्य हो पाएगा।