देश का बड़ा हिस्सा हिंदू और मुसलमानों का है। दोनों के लिए आने वाले दिन धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। दशकों बाद ऐसा हो रहा है कि पुरुषोत्तम मास और रमजान एक साथ पड़ रहे हैं। धार्मिक नगरी हरिद्वार में पूरे महीने भीड़ रहने के आसार हैं। पुरुषोत्तम मास के लिए होटल, धर्मशालाओं और आश्रमों में काफी पहले से ही बुकिंग चल रही थी।

मलमास के रूप में पहचाना गया पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु से जुड़ा है। इस महीने में सूर्य का किसी राशि में संक्रमण नहीं होता। हर चौथे वर्ष पड़ने वाला यह महीना इस साल फिर पड़ा है। 17 जून से पुरुषोत्तम मास का शुभारंभ हो चुका है और यह महीना 16 जुलाई को संपन्न होगा।

संयोग यह कि मुसलमानों का रमजान और ईद भी इसी दौरान पड़ रहे हैं। चांद निकलने पर रमजान का महीना 18 जून से शुरू हो गया है। दोनों पर्व एक साथ आने से देश का एक बड़ा वर्ग धार्मिक कार्यों में जुट गया है। वास्तव में पुरुषोत्तम मास महीनों की बचत से बनाया गया महीना है।

इस साल 12 की बजाए 13 महीने का साल होगा। महीनों की बचत के कारण इस महीने को मलमास नाम दिया गया है। श्रीकृष्ण ने मलमास को भगवान नारायण के पुरुषोत्तम नाम के साथ जोड़ दिया, इस बार आषाढ़ में मलमास पड़ रहा है।

बरसने लगी रहमतें
परवरदिगार की बेशुमार रहमतों का महीना रमजानुल मुबारक आ गया। शुक्रवार (जुमे) को पहला रोजा रखा गया। देहरादून की मस्जिदों और घरों में लोगों ने गुरुवार से तरावीह की नमाज शुरू कर दी। लोगों ने दिन में ही सहरी और इफ्तारी की तैयारी कर ली थी। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के बाजारों में रौनक साफ देखी जा सकती है।

रमजानुल मुबारक जुमा से शुरू हुआ है, इससे लोगों में खुशी दोगुनी हो गई है। लोग इसे शुभ मान रहे हैं। नायब शहर काजी सैयद अशरफ हुसैन कादरी का कहना है कि रमजान के तीन अशरे (भाग) होते हैं। यह पहला अशरा रहमतों का होता है। इसमें परवरदिगार की बेपनाह रहमतें बंदों के लिए होती हैं। बंदा अपने रब से जो भी मांगता है उसे मिलता है।

उन्होंने कहा कि रोजा सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं होता। यह जिस्म के हर हिस्से का रोजा होता है। लोगों को बुराई सुनने, बोलने और देखने से बचना चाहिए। इस मुबारक महीने का हर लम्हा अपने रब की इबादत में लगाना चाहिए। गुरुवार रात शहर के डेढ़ सौ स्थानों पर तरावीह की नमाज अदा की गई। सुबह से सोशल मीडिया पर रमजान की अहमियत से संबंधित संदेश वायरल हो गए।