उत्तराखंड आपदा में बेघर हुए लोगों के लिए नया घर आज भी एक सपना

गोपेश्वर। राज्य में दो साल पहले आई विनाशकारी बाढ़ में हजारों लोगों की जान चली गई, जबकि सैकड़ों परिवार बेघर हो गए। लेकिन प्रभावितों में बहुसंख्य लोगों के लिए नया और सुरक्षित घर आज भी एक दूर का सपना बना हुआ है। कई लोग यह कह रहे हैं कि वे कमजोर और अस्थायी आवास में रह रहे हैं जबकि अन्य आज भी पड़ोसी गांवों में शरणार्थियों की तरह रहने के लिए मजबूर हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2510 परिवारों में से 1800 परिवार उन आवासों में रहने को मजबूर हैं जो आपदा के बाद असुरक्षित और नहीं रहने योग्य घोषित किए जा चुके हैं।

उत्तराखंड में 16-17 जून, 2013 को आई तेज बाढ़ से 4200 गांवों के एक लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे। दर्जनों गांव और मानव बस्तियां बाढ़ में बह गई थीं। रुद्रप्रयाग,  चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर और उत्तरकाशी जिले बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित हुए और सैकड़ों परिवार बेघर हुए। बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए सेमी गांव के मुखिया योगेंद्र बिष्ट ने बताया कि कोई विकल्प नहीं बचने के कारण लोग संभावित खतरे के अंदेशे के बावजूद जर्जर और आधे टूटे मकानों में रहने के लिए मजबूर हैं।

बिष्ट ने कहा कि गांव के कुछ घरों को रहने के लिहाज से पूरी तरह असुरक्षित और क्षतिग्रस्त घोषित किया जा चुका है लेकिन उनके निवासियों को विकल्प के रूप में पूरी तरह बने हुए घर अब तक नहीं मिले हैं। रुद्रप्रयाग जिले के कालीमठ, चिलौंद और चंद्रपुरी गांव भी इसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं।

हालांकि, बिष्ट ने दावा किया कि राज्य सरकार अपना घर खुद बनाए कार्यक्रम के तहत विश्व बैंक की मदद से अब प्रभावित परिवारों के लिए असुरक्षित स्थान पर ही नए घरों का निर्माण करा रही है। राज्य सरकार ने प्रत्येक बेघर परिवार को आपदा रोधी विधि से घर बनाने के लिए पांच लाख रुपये दिए हैं और 40 वर्ग मीटर भूमि आबंटित की है।