टूरिज्म मैप पर ये हैं चम्पावत के नजारे

चम्‍पावत में एक समय चंद वंश के राजाओं का राज था. यह जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता और मंदिरों के लिए जाना जाता है. चम्‍पावत की सुंदरता से तो स्‍वामी विवेकानंद भी आकर्ष‍ित हुए थे. चम्‍पावत जिले में सैर-सपाटे के लिए और प्राकृतिक नजारों का लुत्‍फ लेने के लिए जगहों की कमी नहीं है. ये हैं चम्‍पावत के कुछ खास सैर-सपाटे के स्‍थान

चम्‍पावत शहर
चम्‍पावत शहर जिला मुख्‍यालय है और यह समुद्र तल से 1615 मीटर की ऊंचाई पर बसा है और एक समय चंद वंश के राजाओं की राजधानी हुआ करता था.
कितनी दूर: यह शहर पिथौरागढ़ से 76 किमी और नजदीकी रेलवे स्‍टेशन टनकपुर से 75 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: जिला मुख्‍यालय होने के साथ ही इस शहर का इतिहास भी शानदार है. बालेश्‍वर मंदिर चम्‍पावत की शान है. यहां का नागनाथ मंदिर कुमाऊं की प्राचीन वास्‍तुकला का शानदार उदाहरण है. इसके अलावा चम्‍पावत को ग्‍वेल देवता (गोलू देवता) और भगवान विष्‍णु के कुर्मुवतार के लिए भी जाना जाता है.
कब जाएं: किसी भी मौसम में यहां जा सकते हैं.
इतिहास: चम्‍पावत चंद वंश के राजाओं की राजधानी था. चम्‍पावत में एक छोटा सा किला भी है. इसके अलावा यहां चंद वंश के राजाओं के बनाए कई मंदिर भी हैं.

चम्‍पावत शहर जाएं तो यहां भी सैर करें:

– नागनाथ
हिन्‍दू समाज में देवी देवताओं के अलावा नाग पूजा का अपना अलग स्‍थान है. चम्‍पावत में वासुकी नाग की तरह नागनाथ की पूजा के लिए मंदिर की स्‍थापना वर्तमान तहसील कार्यालय के करीब ही की गई है.

– घटोत्‍कच का मंदिर
यह चम्‍पावत शहर से 2 किमी दूर तामली मोटर मार्ग के किनारे है. यह भीम के बेटे घटोत्‍कच का मंदिर है. महाभारत की लडाई में घटोत्‍कच का सिर कटकर यहां एक जलाशय में गिरा था. धार्मिक पर्वों पर आज भी यहां पर स्‍नान करने का महत्‍व है

– अखिल तारणी
यह उपशक्ति पीठ है. यहां घने हरे देवदार वनों के बीच में भव्‍य प्राचीन मन्दिर व धर्मशाला बनी है. मान्‍यता के अनुसार यहां पांडवों ने घटोत्‍कच का सिर पाने के लिए मां भगवती की प्रार्थना की थी. यह चम्‍पावत से पैदल मार्ग पर 8 मिल की दूरी पर है.

– एक हथिया नौला
चम्‍पावत शहर से सिर्फ 4 किमी दूर ‘एक हथिया नौला’ यानी एक हाथ से बनी हुई वावली मायावती पैदल मार्ग पर है.
यह एक ऐतिहासिक धरोहर है. जगन्‍नाथ मिस्‍त्री ने एक हाथ से इस ऐतिहासिक नौला (वावली) का निर्माण कर दिखा दिया कि प्रबल इच्‍छा शक्ति से कोई भी कार्य असम्‍भव नहीं. यह कलात्‍मक दृष्‍िट से एक अदभूत नमूना है.

– दीप्‍तेश्‍वर महादेव
यह मंदिर चम्‍पावत शहर से 2 किमी दूर पिथौरागढ़ की सड़क से सिर्फ 1 किमी दूर है. यह उत्‍तर वाहनी गंडकी नदी के किनारे पर बसा बहुत सुंदर स्‍थान है और यहां श्रद्वा से पूजा-पाठ करने पर भाग्‍यवश दीप के दर्शन होते है. यहां पर शिव गाथा काफी जागृत है.

– मां भगवती हिंगला
मां भगवती हिंगला का मंदिर चम्‍पावत शहर से 4 किमी दूर ललुवापानी सड़क से 2 किमी दूर पर्वत शिखर पर है. यहां से चम्‍पावत मुख्‍यालय का सीन बेहद सुंदर दिखाई देता है. यह उपशक्ति पीठ है और नवरात्रयों में यहां बड़ी भीड़ रहती है.

– ताड़केश्‍वर महादेव
ताड़केश्‍वर महादेव चम्‍पावत मुख्‍यालय से 5 किमी दूर टनकपुर मुख्‍य मोटर मार्ग के किनारे है. यह भगवान शिव का बहुत प्राचीन मंदिर है और यहां चम्‍पावत नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र का श्‍मशान घाट भी है.

– सप्‍तेश्‍वर
यह स्‍थान चम्‍पावत से 14 किमी दूर है. यहां शिव का बेहद सुन्‍दर मंदिर है और यहां पर अब एक छोटा बिजली घर भी है.

– क्रान्‍तेश्‍वर महादेव
यहां कुर्मु पर्वत की चोटी पर सुंदर व भव्‍य मंदिर बना है. माना जाता है कि कुर्मु पर्वत के नाम पर ही कुमाऊं शब्‍द बना है. यहां एक पत्‍थर पर भगवान विष्‍णु के पद चिन्‍ह आज भी दिखाई देते हैं. इन्‍ही पद चिन्‍हों की पूजा की जाती है. यह चम्‍पावत शहर से 6 किमी और समुद्र तल से 6000 फीट की ऊंचाई पर बसा है.

– ऋखेश्‍वर महादेव
यह चम्‍पावत जिला मुख्‍यालय से 12 किमी दूर लोहाघाट के पास है. यहां शिव मंदिर के अलावा कई देवी देवताओं के भव्‍य मंदिर बने है.

– मानेश्‍वर महादेव
चम्‍पावत शहर से करीब 7 किमी दूर पिथौरागढ़ मोटर मार्ग से एक किमी की दूरी पर एक शिखर पर बना यह मंदिर काफी प्राचीन है. कहावत है कि जब पांडव अपने पितरों का श्राद करने मानसरोवर को जा रहे थे, तब इस स्‍थान पर पहुंचते–पहुंचते श्राद का दिन आ गया. तब पांडु पुत्र अर्जुन ने अपने गान्‍डीव से तीर चलाकर जल धारा पैदा की व पितरों का श्राद तर्पण किया.

– मागेश्‍वर महादेव
यहां देवदार वनों के बीचों-बीच पैड़ी के ऊपर बना शिव–मन्दिर बहुत सुंदर है. यहां रहने के लिए धर्मशाला भी है. यहां यात्रि‍यों को फल-फूल खाकर ही पूजा-पाठ करनी होती है. नमक व अनाज यहां वर्जित है. मागेश्‍वर महादेव खेतीखान मोटर मार्ग से 2 किमी दूर है और चम्‍पावत शहर से यहां पैदल जाया जाता है.

– मल्‍लाणेश्‍वर
यह स्‍थान चम्‍पावत से 12 कि.मी. दूरी पूर्व की तरफ देवदार बनी के बीच नदी के किनारे चम्‍पावत-तामली मोटर मार्ग में बसा है मान्‍यता के अनुसार यह भी न्‍याय के लिए प्रसिद देव हैं यहां पर नहाने आदि का सुन्दर स्‍थान व व्‍यवस्‍था है

– हरेश्‍वर महादेव
चम्‍पावत से पूर्व की ओर तामली मोटर मार्ग के मौन पोखरी से 5 कि.मी. की दूरी पर हरेश्‍वर महादेव का मंदिर है. यहां पर भोले-भंडारी का मंदिर है. मान्‍यता है कि यहां के भोले बाबा बडे़ न्‍याय प्रिय देवता हैं. यहां स्‍टाम्‍प पेपर पर लिखी हुई अजियां टंगी रहती हैं.

चम्पावत जिले में सैर सपाटे के और महत्वपूर्ण स्थान

लोहाघाट
समुद्र तल से 1706 मीटर की ऊंचाई पर बसे लोहाघाट में गर्मी का मौसम खास होता है. इन दिनों यहां बुरांस के लाल फूलों से पूरा इलाके गुलजार हो जाता है और बुरांश की खुशबू व ठंड‍क पर्यटकों को मोह लेती है.
कितनी दूर: पिथौरागढ़ से 62 किमी और चम्‍पावत से 14 किमी दूर.
क्‍यों जाएं: यह ठंडा इलाका है और गर्मी की छुट्ट‍ियां बिताने के लिए बेहतरीन जगह भी. यहां आप बुरांश के ठंडे जूस का भी भरपूर लुत्‍फ ले सकते हैं. लोहाघाट शहर से करीब 5 कि.मी. दूर झूमा देवी मंदिर है. मां भगवती का भव्‍य मंदिर यहां एक पर्वत शि‍खर पर बना है.
कब जाएं: सालभर कभी भी जा सकते हैं, लेकिन गर्मियां खास हैं.
इतिहास: इस जगह का अपना ऐतिहासिक व पौराणिक महत्‍व भी है. 1842 में यहां पहुंचे एक अंग्रेज को यह जगह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि भारत सरकार इसे अपनी ग्रीष्‍मकालीन राजधानी क्‍यों नहीं बनाती.

एबॉट माउंट
इस जगह को एक अंग्रेज जॉन एबॉट ने ढूंढा था. आजादी से पहले उन्‍होंने अपने नाम से इस पहाड़ का नाम रखा और यहां 13 कॉटेज बनाए, जिनमें से कुछ अब भी हैं. यहां बनी एबॉट माउंट कॉटेज में रुकने और खाने की अच्‍छी व्‍यवस्‍था है.
कितनी दूर: लोहाघाट से 9 किमी और काठगोदाम रेलवे स्‍टेशन से 165 किमी दूर.
क्‍यों जाएं: यहां से त्रिशूल, नंदाकोट, नंदाघुती और नंदादेवी जैसे हिमालय की चोटियों का नजारा लिया जा सकता है. यहां घाटी के पार ये सभी हिमालय की चोटियां अर्धचंद्राकार रूप में बिल्‍कुल सामने दिखती हैं.
कब जाएं: कभी भी जा सकते हैं, लेकिन यहां गर्मियों का मौसम खास होता है.
इतिहास: एक अंग्रेज ने इस जगह को ढूंढा और अपने नाम पर इसका नाम रखा. 1942 में यहां एक चर्च बना था, जिस पर अक्‍सर ताला जड़ा रहता है. यहां साल में एक या दो बार प्रार्थना होती है.
एंडवेंचर टूरिज्‍म: हिमाचल प्रदेश के चैल के बाद यहां दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची क्रिकेट पिच है. यह 7000 फीट की ऊंचाई पर है.

मायावती आश्रम
यह आश्रम समुद्र तल से 1940 मीटर की ऊंचाई पर बसा है. अद्वैत आश्रम बनने के बाद से मायावती खास प्रचारित हुआ है. यहां देश-विदेश से ऐसे लोग आते रहते हैं, जिनका झुकाव आध्‍यात्‍म की ओर है.
कितनी दूर: चम्‍पावत से 22 और लोहाघाट से 9 किमी दूर.
क्‍यों जाएं: आध्‍यात्‍म की ओर झुकाव है या आत्‍म शांति के लिए यहां जा सकते हैं. इसके अलावा यहां से खूबसूरत हिमालय की चोटियों के दर्शन भी होते हैं. यहां एक लाइब्रेरी और छोटा म्‍यूजियम भी है.
कब जाएं: साल भर कभी भी जा सकते हैं, लेकिन गर्मियां खास हैं.
इतिहास: 1898 में स्‍वामी विवेकानंद यहां आए थे. यहां आने के बाद उन्‍होंने ‘प्रबुद्ध भारत’ के पब्‍लिकेशन ऑफिस को मद्रास से मायावती में शिफ्ट कर दिया और यह तब से यहीं है.

चमू देवता मंदिर
काली नदी के पश्चिम तट से मिले हुए इस क्षेत्र को पुरातन काल में गुमदेश के नाम से जाना जाता था. चमू देवता का यह मंदिर अखिल तारिणी पर्वत श्रंखला के पूर्वी भाग में है.
क्‍यों जाएं: चैत्र महीने की दशमी को यहां बड़ी धूमधाम के साथ एक मेले का आयोजन होता है. मेले में एक डोले को सभी गांवों-मुहल्‍लों से घुमाते हुए चमू देवता के मंदिर में लाया जाता है.
कब जाएं: चैत्र महीने की दशमी पर मेला देखने का सौभाग्‍य मिलना बड़ी बात है.
इतिहास: मान्‍यता है कि पूर्वकाल में एक दैत्‍य बारी-बारी से रोज एक आदमी को खाता था. एक वृद्धा की प्रार्थना पर देवता ने उस दैत्‍य को मार गिराया. तभी से देवता के प्रति आभार प्रकट करने के लिए यहां मेला लगता है.

कांकर
कांकर शारदा नदी के किनारे बूम नामक स्‍थान पर टनककपुर-पूर्णागिरी मोटर मार्ग पर स्‍थित है.
कितनी दूर: टनकपुर से कांकर सिर्फ 5 किमी दूर है और टनकपुर में रेल और सड़क व्‍यवस्‍था अच्‍छी है.
क्‍यों जाएं: यह अति प्राचीन यज्ञ स्‍थल है. यहां आज भी प्राचीन हवन कुंड आदि दिखाई देते हैं. इसके अलावा जब सूर्य उत्‍तरायण होते हैं तो इस जगह पर हवन, मुंडन व जनेऊ (यज्ञोपवीत) करने का खास महत्‍व है.
कब जाएं: जनवरी महीने में उत्तरायणी के मौके पर यहां जाने का सही समय है.
इतिहास: पुराणों के अनुसार सृष्‍टिकर्ता ब्रह्मा ने यहां एक यज्ञ किया था, जिसमें सभी देवी-देवता पहुंचे थे.

व्‍यानधुरा
व्‍यानधुरा आस्‍था का केन्‍द्र है. मान्‍यता के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के समय भगवती की अराधना की और अस्‍त्र शत्रों को इसी स्‍थान पर छिपाया था. यहां एडी और व्‍यान को राजशी देव के रूप में पूजा जाता है और ये न्‍याय के प्रतीक हैं.
कितनी दूर: टनकपुर से करीब 25 किमी दूर. इसकी कई शाखाएं हैं. एक शाखा चम्‍पावत से 3 किमी दूर ललुवापानी मोटर मार्ग से 1.5 किमी की दूरी पर भी है.
क्‍यों जाएं: यह इलाका कई प्रकार के वन्‍य जन्‍तुओं से भी भरा पूरा है. मंदिर के चारों ओर मन को मोह लेने वाला प्राकृतिक सौंदर्य बिछा हुआ है. मंदिर में धनुश–बाण, त्रि‍शूल इकट्ठे है. यहां ऐडी को अर्जुन और व्‍यान को धर्मराज युधिष्टिर का अवतार मानते हैं.
कब जाएं: यहां साल भर कभी भी जा सकते हैं.
इतिहास: यहां मुगल कालीन लेख भी मिले हैं, जिससे पता चलता है कि मुगलों का यहां तक दखल था.

गोरखनाथ
यह जगह गुरु गोरखनाथ की तप स्‍थली है. आध्‍यात्मिक शांति पीठ प्राकृतिक सौन्‍दर्य से भरपूर्व पर्वत के शिखर पर है. इसके चारों तरफ हरे-भरे चारागाह हैं. और यह वन्‍य जीव जन्‍तुओं की शरण स्‍थली है.
क्‍यों जाएं: यहां चारों तरफ बड़े चारागाह दिखाई देते हैं, इनमें वन्‍य जीव-जन्‍तुओं को आराम से घूमते हुए देखा जा सकता है. यह जगह यात्रियों के लिए अदभुत वैकुंठ धाम की तरह है. यहां भागवान गोरखनाथ की हमेशा जलने वाली धूनी से श्रद्धालुओं को प्रसाद दिया जाता है.
कब जाएं: साल के किसी भी मौसम में यहां जा सकते हैं.

पूर्णागिरि मंदिर
पूर्णागिरी मंदिर समुद्र तल से 3000 मी‍टर की ऊंचाई पर है. यहां की वादियों में मंदिर की घंटियों की गूंज सुनाई देती है. प्राकृतिक सुंदरता अपने चरम पर है. इसे पुण्‍यागिरी के नाम से भी जाना जाता है.
कितनी दूर: टनकपुर से 20 किमी, पिथौरागढ़ से 171 किमी और चम्‍पावत जिला मुख्‍यालय से 92 किमी दूर है पूर्णागिरी मंदिर.
क्‍यों जाएं: पूर्णागिरी में मां भगवती का आशीर्वाद लेने और प्राकृतिक सुंदरता का लुत्‍फ लेने के लिए पर्यटक आते हैं. यहां से टनकपुर शहर और बॉर्डर पार नेपाल के कुछ गांव भी दिखाई देते हैं.
कब जाएं: यहां साल भर पूरे देशभर से श्रद्धालु आते रहते हैं. खासकर मार्च-अप्रैल में चैत्र नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की खासी भीड़ रहती है.

ग्‍वेल देवता
ग्‍वेल देवता को गोरिल और गोलू देवता के नाम से भी जाना जाता है. चम्‍पावत ही नहीं समूचे कुमाऊं अंचल में ग्‍वेल देवता की मान्‍यता और प्रभाव है.
कितनी दूर: चम्‍पावत के ग्‍वैरेल चौड़ में ग्‍वेल देवता का विशाल मंदिर है.
क्‍यों जाएं: ग्‍वेल देवता आज भी अपने न्‍याय के लिए जाने जाते हैं. कहा जाता है कि ग्‍वेल देवता के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता. वे हर किसी का न्‍याय करते हैं.
कब जाएं: साल भर कभी भी ग्‍वेल देवता के दर्शन किए जा सकते हैं.
इतिहास: कहा जाता है कि ग्‍वेल चम्‍पावत के कत्‍यूर राज्‍य के राजकुमार थे. उन्‍हें उनकी न्‍याय प्रि‍यता के लिए जाना जाता था. लेकिन उनके साथ भी अन्‍याय हुआ. कहा जाता है कि उनकी सौतेली मां ने उनके साथ धोखा किया और उन्‍हें लोहे के एक पिंजरे में बंद करके नदी में फेंक दिया था.

बालेश्वर मंदिर
चम्‍पावत का बालेश्‍वर मंदिर सबसे कालात्‍मक मंदिरों में गिना जाता है. यहां चंद्र वंश के प्रारंभिक राजाओं द्वारा बालेश्‍वर, रत्‍नेश्‍वर और चम्‍पावती दुर्गा को समर्पित मंदिरों के समूह का निर्माण कराने के सबूत आज भी हैं.
कितनी दूर: पिथौरागढ़ से 76 किमी दूर है बालेश्‍वर मंदिर.
क्‍यों जाएं: मंदिर में कभी जटिल संरचना हुआ करती थी, यहां अभयारण्‍य और मंडप भी हुआ करता था. मंदिर की छत पर आज भी जटिल नक्‍काशी अपने प्राचीन गौरव और कलात्‍मक उत्‍कृष्‍टता की कहानी बयान करती है.
कब जाएं: साल भर कभी भी यहां जा सकते हैं.
इतिहास: शुरुआती चंद वंश के राजाओं ने इस मंदिर का निर्माण कराया और इसके सबूत आज भी यहां दिखाई पड़ते हैं.

रीठा साहिब
रीठा साहिब में ही सिख पंथ के पहले गुरु गुरुनानक का नाग योगियों से पहली बार सामना हुआ था. यहां उन्‍होंने भगवान का नाम लेने के साथ ही मानव सेवा के लिए नाथ योगियों को मनाने की कोश‍िश की थी.
कितनी दूर: नानक माथा से यह 209 किमी और टनकपुर रेलवे स्‍टेशन से 166 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: गुरुनानक के जीवन को समझने और उनसे जुड़ी इस जगह के दर्शन के लिए यहां श्रद्धालु सालभर आते रहते हैं. यहां आज भी रीठा का एक पेड़ मौजूद है. श्रद्धालुओं को इसी पेड़ से रीठे प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं.
कब जाएं: साल भर कभी भी यहां जा सकते हैं.
इतिहास: सिख पंथ के पहले गुरु गुरुनानक के जीवन से जुड़ी है यह जगह.

आदित्य मंदिर
सूर्य मंदिर के लिए मशहूर यह गांव चम्‍पावत से 75 किमी दूर है. कोर्णाक के सूर्य मंदिर की ही तरह यह भी भगवान सूर्य का मंदिर है. चंद वंश के राजाओं ने इस मंदिर का निर्माण किया.
क्‍यों जाएं: कोर्णाक सूर्य मंदिर के अलावा दूसरा सूर्य मंदिर देखने के लिए यहां पर्यटक आते हैं. यहां एक बड़े पेड़ के नीचे आदि और भूमियां मंदिर भी हैं.
कब जाएं: साल भर कभी भी यहां जा सकते हैं.
इतिहास: चम्‍पावत में राज करने वाले चंद वंश के राजाओं ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था.

पंचेश्वर
सरयू और काली नदी के संगम पर बसा पंचेश्‍वर भारत और नेपाल के बीच सीमा रेखा का काम भी करता है. यह जगह चमू के मंदिर के लिए भी मशहूर है. संगम पर मेला लगता है और यहां स्‍नान का भी महत्‍व है. चमू को यहां जानवरों, घंटियों और दूध के रक्षक के रूप में पूजा जाता है.
कितनी दूर: पंचेश्‍वर लोहाघाट से करीब 40 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: यहां पर मेला लगता है और स्‍नान का महत्‍व भी है. पंचेश्‍वर में भगवान शिव का मेंदिर है.
कब जाएं: साल में कभी भी यहां जा सकते हैं.