हिमालयी क्षेत्र में जिस जड़ी की मांग सबसे ज्यादा है, वह यारसागंबू (कीड़ा जड़ी) है। यौनवर्धक दवाएं बनाने में काम आने वाली इस जड़ी की देशी, विदेशी बाजार में भारी मांग के चलते अच्छे दाम मिलते हैं।

यही वजह है कि अबकी बार भी दो महीने तक अपना घर छोड़कर लोग कीड़ा जड़ी की खोज में निकल गए हैं, इसमें जोखिम भी बहुत ज्यादा है। कीड़ा जड़ी निकालने वाले लोग हिमस्खलन (एवलॉन्च) की चपेट में आने के अंदेशे के बीच जान पर खेल यारसागंबू की खुदाई में जुटे हुए हैं।

इन दिनों बोना, गोल्फा, तोमिक, नाथिंग, टांगा आदि गांवों के 150 परिवार पंचाचूली पर्वतमाला के पास स्थित कुल्कू नामक स्थान पर जड़ी की खोज में जुटे हैं। यह स्थान मुनस्यारी मुख्यालय से 65 किलोमीटर और बोना गांव से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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लोग जड़ी खोदने के लिए मई महीने की शुरुआत में ही घर से निकल जाते हैं और बरसात शुरू होने पर ही वापस लौटते हैं। इन गांवों के साथ ही नागनीधूरा, राजरंभा, रालम, पोटिंग, ल्वा, गोरीपार आदि के तकरीबन 1200 परिवार कीड़ा जड़ी निकालने का काम कर रहे हैं।

पापड़ी ग्राम पंचायत के निवासी मंदीप सिंह पांगती कुछ दिन पहले कुल्कू से लौटे हैं। वह बताते हैं कि जड़ी खोदने वाले लोग एक महीने का राशन वहां पहुंचा देते हैं। एक परिवार 1000 से 1200 जड़ी तक यानी आधा किलो के करीब जड़ी खोद लेता है। जैसे-जैसे बर्फ पिघलती है, जड़ी मिलती जाती है।

इस बार बर्फ ज्यादा है और पिघली भी नहीं है। इसलिए कीड़ा जड़ी कम निकल रही है। इन गांवों के लोगों को कीड़ा जड़ी निकालने की अनुमति है। प्रति व्यक्ति कीड़ा जड़ी की 500 रुपये की रॉयल्टी वन पंचायत में जमा की जाती है।

बाहर से ठेकेदार आकर कीड़ा जड़ी खरीद ले जाते हैं। पिछले साल 10 लाख रुपये किलो कीड़ा जड़ी बिकी थी। बहुत लोगों की जड़ी खरीददार न मिलने से नहीं बिकी थी। गौरतलब है कि कीड़ा जड़ी महज चार महीने तक ही सुरक्षित रहती है। उसके बाद इसमें कीड़े पड़ जाते हैं। यह काली पड़ जाती है।

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यारसागंबू जड़ी खोदने का ऐसा क्रेज हैं कि बच्चे पढ़ाई छोड़ जड़ी निकालने चल देते हैं। कीड़ा जड़ी निकालकर जब लौटते हैं तो स्कूल में मेडिकल सर्टिफिकेट जमा करा देते हैं।