उत्तराखंड संस्कृत विवि के कुलपति पर प्रमाणपत्रों में फर्जीवाड़े का आरोप

देशभर में फर्जी डिग्री से नौकरी पाने वालों की कोई कमी नहीं है, लेकिन जब किसी विश्वविद्यालय के कुलपति पर भी फर्जी प्रमाण पत्र या डिग्री से नौकरी हासिल करने का आरोप लग जाए तो समझिए मामला काफी गंभीर हो चुका है। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार में भी ऐसा ही हुआ है। यहां के कुलपति की नियुक्ति फर्जी प्रमाण पत्र के आधार होने का मामला सामने आया है।

आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना में जो प्रमाण पत्र उपलब्ध कराए गए हैं, उसमें कई गड़बड़िया सामने आयी हैं। मामला शिक्षा मंत्री के पास पहुंचने पर मंत्री ने पूरे मामले जांच के लिए कहा है। सामाजिक कार्यकर्ता श्याम लाल सुंदरियाल ने इस संबंध में सूचना मांगी थी, जिसमें मिली जानकारी से यह खुलासा हुआ है।

उधर, संस्कृति विवि के कुलपति महावीर अग्रवाल का कहना है कि राजभवन ने उनसे प्रमाण पत्रों की कॉपी मांगी थी। एक कॉपी उन्होंने सूचना मांगने वाले व्यक्ति को दी है। उन्होंने कहा कि जो भी प्रमाण पत्र दिए हैं वह एकदम ठीक हैं। मामला सामने आने के बाद यूकेडी नेता मनमोहन लखेड़ा ने एक बार फिर से कुलपति पद पर महावीर अग्रवाल की नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने कहा कि पूर्व राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी ने साल 2013 में अग्रवाल को कुलपति के पद पर नियुक्ति दी थी, जबकि पहले से उन पर कई गंभीर आरोप थे। लखेड़ा ने कुलपति अग्रवाल के कार्यकाल में जिन आठ प्रोफेसरों की नियुक्ति हुई है, उस पर भी सवाल उठाए हैं।

उनका कहना है कि अब मामले की जांच होगी तो सच्चाई सबके सामने आ जाएगी। इसके साथ ही गलत तरीके से नियुक्ति पाने वाले करीब आठ प्रोफेसरों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी।

सूचना के अधिकार कानून के तहत जो प्रमाण पत्र मिले हैं उसमें कुलपति को मध्यमा नवीं एवं दसवीं की परीक्षा सन् 1966 में पास करने और अंक तालिका एक सितंबर 1976 में जारी होना दर्शाया गया है। 1976 को जारी की गई मध्यमा की अंक तालिका में उनके पिता का नाम भी गायब है।

तीन वर्षीय शास्त्री परीक्षा 1968 में श्रीमद्धयानंद आर्ष विद्यापीठ गुरुकुल झज्जर, रोहतक, हरियाणा से एवं इसी महाविद्यालय से दो वर्षीय आचार्य की डिग्री 1969 से करना दर्शाया है। सवाल यह है कि दो वर्ष के पाठ्यक्रम को एक साल में कैसे पूरा किया गया। मामले में बताया गया है कि 1968 में जिस विद्यापीठ से शास्त्री की गई उसे 1968 तक मान्यता ही नहीं थी।