केदारनाथ त्रासदी : लोग दाने-दाने को मोहताज थे और अधिकारी चिकन-मटन की दावत उड़ा रहे थे

2013 में केदारनाथ त्रासदी के नाम पर उत्तराखंड में जबरदस्त लूट मची और फर्जी बिलों के जरिए भुगतान कराए गए। हैरानी की बात ये है कि त्रासदी 16 जून 2013 को आयी तो जाहिर है राहत कार्य इसके बाद ही शुरू होने चाहिए थे, लेकिन अधिकारी इतने मुस्तैद थे कि पिथौरागढ़ में 22 जनवरी 2013 को यानी करीब 115 दिन पहले ही राहत व बचाव कार्य शुरू कर दिया गया। कई जगहों पर तो अधिकारियों ने हद ही कर दी, घटना के करीब 7 महीने बाद यानी 28 दिसंबर 2013 को राहत व बचाव कार्य शुरू किया और राहत कार्य शुरू होने से 43 दिन पहले ही 16 नवंबर 2013 को पूरा भी कर लिया।

दरअसल 2013 में केदारनाथ त्रासदी से जुड़े कई सनसनीखेज खुलासे एक RTI के ज़रिए हुए हैं। जिसमें पता चला है कि उत्तराखंड में जून 2013 में आई प्रलयकारी बाढ़ से मची तबाही के दौरान हज़ारों लोग बिना खाए-पिए जहां दिन गुज़ारने को मजबूर थे, लोग दाने-दाने को मोहताज थे, उस वक्त राहत के काम में जुटे राज्य सरकार के अफसर मटन, चिकन और अन्य स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ ले रहे थे।

RTI में खुलासा हुआ है कि वहां अफ़सर 7 हज़ार रुपये के किराए पर होटल में ठहरकर राहत व बचाव कार्य देख रहे थे। आरटीआई के जरिए राहत और बचाव कार्य में बड़े वित्तीय अनियमितताओं की बात का भी खुलासा हुआ है। उत्तराखंड के सूचना आयुक्त अनिल शर्मा ने इस मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश की है।

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार आधे लीटर दूध के लिए 194 रुपये की कीमत वसूली गई। ये तो कुछ भी नहीं, धांधली का खेल इतने चरम पर था कि दोपहिया वाहनों को डीजल की सप्लाई की गई और एक ही व्यक्ति को दो बार राहत दे दी गई। यहीं नहीं, एक ही दुकान से तीन दिन के भीतर 1800 रेन कोट की खरीद की गई। राहत के काम में लगे हेलिकॉप्टर में ईंधन भरने के लिए भी 98 लाख रुपये का भुगतान किया गया।

नेशनल एक्शन फोरम फॉर सोशल जस्टिस से जुड़े भूपेंद्र कुमार की शिकायत पर उत्तराखंड के सूचना आयुक्त ने 12 पेज के अपने आदेश में कहा है, ‘अपीलकर्ता की ओर से पेश रिकॉर्ड को देखकर लगता है कि उनकी शिकायत उत्तराखंड के मुख्य सचिव के पास भेजी जानी चाहिए। साथ ही यह निर्देश दिया जाता है कि मुख्यमंत्री को इस बारे में जानकारी दी जाए, ताकि वे सीबीआई जांच करवाने को लेकर फैसला ले सकें।’