विधायिकाओं में कानून निर्माण से पहले हो पर्याप्त चर्चा : राष्ट्रपति

देहरादून।… राष्ट्रपति मुखर्जी ने उत्तराखंड पहुंचकर उत्तराखंड विधानसभा को संबोधित किया। उन्होंने देश में विधायिकाओं में विधि निर्माण पर लगने वाले समय और चर्चा के कम होते जाने पर चिंता प्रकट की। उन्होंने कहा कि यह खेदजनक है कि पूरे देश में विधायिकाओं में विधि निर्माण पर लगाया जाने वाला समय धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। कानून पारित करने से पहले उस पर पर्याप्त परिचर्चा होनी चाहिए। वरना वह अपेक्षित परिणाम देने मे असमर्थ रहेगा और अपने उददेश्यों पर खरा नहीं उतरेगा।

उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान उन्होंने कहा कि प्रशासन की बढ़ती जटिलताओं के मद्देनजर कानून पारित करने से पहले उस पर पर्याप्त परिचर्चा और जांच होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह अपेक्षित परिणाम देने में असमर्थ रहेगा और अपने उद्देश्य पूरा नहीं कर पाएगा।

राष्ट्रपति ने वित्त से जुड़े मामलों में अत्यधिक सतर्कता बरतने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह याद रखा जाना चाहिए कि विधायिका के अनुमोदन के बिना कार्यपालिका न तो कोई व्यय कर सकती है और न ही कोई कर लगा सकती है और न ही राज्य की समेकित निधि से धन निकाल सकती है।

इस संबंध में मुखर्जी ने विधायिका के सत्रों के दौरान बैठकें बढ़ाए जाने की भी बात कही। उन्होंने कहा कि अध्यक्षों के सम्मेलनों में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि हर वर्ष कम-से-कम 100 दिन बैठकें आयोजित होनी चाहिए।

राष्ट्रपति ने इस बात पर संतोष जताया कि मौजूदा 16वीं लोकसभा पूरी गंभीरता से अपनी भूमिका और दायित्वों को निभा रही है। उन्होंने कहा कि 16वीं लोकसभा ने अभी तक 90 दिन बैठकें की हैं तथा 55 सरकारी विधेयक पारित किए हैं। 24 विधेयक हाल ही में संपन्न चतुर्थ सत्र में पारित हुए हैं।

राष्ट्रपति ने बताया कि इस लोकसभा में 318 सदस्य पहली बार चुनकर आए हैं तथा गुणवत्तापूर्ण बहस और परिचर्चा पर लगने वाला समय काफी बढ़ा है। उन्होंने इस बात पर भी खुशी व्यक्त की कि भारत और बांग्लादेश के बीच जमीनी सरहद पर करार को संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से पारित किया। उन्होंने कहा कि इस विधेयक पर सर्वसम्मत मतदान से बांग्लादेश को मैत्री का एक मजबूत संदेश गया है तथा इसने दुनिया को दिखा दिया कि भारत राष्ट्रीय हित के मामले में एकजुट है।

उन्होंने उत्तराखंड विधानसभा सहित अन्य प्रदेशों की विधानसभाओं को भी बैठकों की संख्या बढ़ाने पर विचार करने को कहा ताकि राज्य के मसलों पर गंभीरता से परिचर्चा और बहस हो सके।

विधानसभा में सदैव शालीनता और अनुशासन बनाए रखने की सीख देते हुए राष्टपति ने कहा कि असहमति को शालीनता और संसदीय व्यवस्थाओं की सीमाओं और मापदंडों के तहत व्यक्त किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में परिचर्चा, असहमति तथा निर्णय का स्थान होना चाहिए, व्यवधान का नहीं।

इसके अलावा राष्ट्रपति मुखर्जी ने कहा कि वर्ष 2000 में राज्य निर्माण के बाद से उत्तराखंड ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। अब राज्य को नई उंचाइयों तक पहुंचाने मे नेतृत्व प्रदर्शित करने का समय आ गया है। उन्होंने प्रदेश में शिक्षा, खेल तथा सूचना प्रोद्यौगिकी के विकास की भी अपार संभावनाओं की बात भी कही।