सिंचाई विभाग के अधिकारियों को न तो भीमताल के पर्यटन से कोई लेना देना है और न ही कारोबारियों से। यही वजह है कि वह अब तक अंग्रेजों के जमाने के भीमताल झील से पानी छोड़ने संबंधी शासनादेश पर बदस्तूर अमल करते रहे हैं। विभाग को यदि भाबर को पानी देना है तो पहले इसके लिए ठोस योजना तैयार करे, ताकि यह सुनिश्चित हो कि छोड़ा गया पानी गौला तक पहुंच रहा है या नहीं।

हर साल गर्मियों में पानी खोलने के बाद झील इतनी सूख जाती है कि कोई भी उसमें नौकायन करना पसंद नहीं करते, वहीं झील का एक छोर पूरी तरह से मैदान बन जाता है। इसका सीधा असर क्षेत्र के पर्यटन व्यवसाय पर पड़ता है। होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष विनोद गुणवंत का कहना है कि जिला प्रशासन पहले इस बात की जांच कराए कि भीमताल झील का कितना पानी गौला तक पहुंचता है और कितना पानी बर्बाद होता है, उसके बाद कोई फैसला लें।

पर्यटन व्यवसायी देवेंद्र फर्त्याल बताते हैं कि पिछले दिनों उन्होंने आरटीआई के तहत विभाग से गौला तक पानी पहुंचने के बारे में सूचना मांगी थी, लेकिन विभाग के पास ऐसी कोई सूचना नहीं थी। व्यापार मंडल के संरक्षक और पूर्व कनिष्ठ प्रमुख रामपाल सिंह गंगोला कहते हैं कि विरोध भाबर को पानी देने का नहीं है बल्कि विरोध झील के पानी की बर्बादी पर रोक लगाने का है।

नगर कांग्रेस अध्यक्ष डीके डालाकोटी कहते हैं कि भाबर को पानी छोड़ा जाए, लेकिन पहले ठोस योजना तैयार हो। नौका चालक संगठन से जुड़े लोग भी चाहते हैं कि चौबीस घंटे पानी खोलने के बजाए पानी खोलने का समय निर्धारित कर लिया जाए।