जहां रहती थी कभी जिंदगी की रौनक, आज वो आंगन वीरान पड़ा है…

 

वो घर जहां कभी बच्चों की किलकारियां गूंजा करती थीं
वो घर जहां कभी शादी-ब्याह की शहनाईयां गूंजा करती थीं,
तुम चले गए अपने बुजुर्गों के उस आंगन को छोड़ कर
कभी तो घर वापसी करो खुद को उनकी यादों से जोड़ कर।

वो आंगन आज सूना है,
तूने शहर में अपना आशियाना बुना है
गांव का वो घर आज टूटा पड़ा है
जहां रहती थी कभी रौनक, आज वो आंगन वीरान पड़ा है।