पूर्णागिरि मंदिरः इस शक्तिपीठ में देवी सती की नाभि की पूजा होती है

पूर्णागिरि मंदिर की वादियों में मंदिर की घंटियों की गूंज सुनाई देती है. यहां प्राकृतिक सुंदरता अपने चरम पर है. इसे पुण्‍यागिरी के नाम से भी जाना जाता है. हर साल यहां करीब तीन महीने तक मेले का आयोजन होता है.

पूर्णागिरि मेला उत्तराखंड के चंपावत जिले में पूर्णागिरि मंदिर परिसर में आयोजित किया जाता है. यहां विश्वत संक्रांति को मेला शुरू होकर 3 महीने तक चलता है. मार्च और अप्रैल में चैत्र नवरात्रि के मौके पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शनों के लिए आते हैं. यहां नदी के दूसरी ओर नेपाल का प्रसिद्ध ब्रह्मा-विष्णु का मंदिर ब्रह्मदेव मंदिर कंचनपुर में स्थित है. ब्रह्मदेव मंदिर कंचनपुर जाने के लिए नदी पर बने बैराज से होकर रास्ता जाता है, जिस पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवान तैनात रहते हैं.

पूर्णागिरि मंदिर यहां के अन्नपूर्णा शिखर पर 3000 मीटर करीब 5500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है. यह 108 सिद्ध पीठों में से एक है. इस स्थान को महाकाली की पीठ माना जाता है. कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की कन्या और शिव की अर्धांगिनी सती की नाभि का भाग यहां पर विष्णु के सुदर्शन चक्र से कट कर गिरा था. पूर्णागिरि मेले के लिए हर साल राज्य सरकार द्वारा अनुदान की धनराशि जिलाधिकारी चंपावत के माध्यम से मेले के आयोजनकर्ता जिला पंचायत चंपावत को उपलब्ध कराई जाती है.

धार्मिक महत्वः
शिवपुराण में रुद्र संहिता के अनुसार दक्ष प्रजापति की कन्या पार्वती (सती) का विवाह भगवान शिव के साथ किया गया था. एक समय दक्ष प्रजापति द्वारा यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें समस्त देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया लेकिन महादेव का अपमान करने की मंसा से उन्हें निमंत्रण नहीं भेजा गया.

अपने पति महादेव के अपमान के विरोध में दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ कुंड में स्वयं कूदकर प्राणों की आहूति दे दी थी. भगवान भोले-भंडारी क्रोधित होकर देवी सती की देह को लेकर ब्रमांड में भटक रहे थे, तब भगवान विष्णु ने शिव शंकर के तांडव नृत्य को देखकर अपने चक्र से महादेव के क्रोध को शान्त करने के लिए सती के शरीर के 64 टुकड़े कर दिए. जहां-जहां देवी के शरीर के हिस्से गिरे, वहां-वहां एक शक्ति पीठ स्थापित हुआ. इसी क्रम में पूर्णागिरि शक्ति पीठ स्थल पर सती पार्वती की नाभि गिरी थी. पूर्णागिरि में देवी की नाभि के दर्शन व पूजा-अर्चना की जाती है.

कितनी दूरः
पूर्णागिरि मंदिर टनकपुर से 20 किमी, पिथौरागढ़ से 171 किमी और जिला मुख्‍यालय चंपावत से करीब 92 किमी दूर है. यह मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है. टनकपुर भारतीय रेल नेटवर्क से जुड़ा हुआ है. इसके अलावा यहां के लिए तमाम शहरों से बस सेवा भी उपलब्ध हैं.

कब जाएं:
पूर्णागिरि मे सालभर तीर्थयात्रियों का भारत के सभी इलाकों से आना लगा रहता है. विशेषकर नवरात्रि (मार्च-जून) के महीने मे भक्त काफी संख्या में यहां पहुंचते हैं. माता के दर्शनों के लिए भक्त पूरे भक्तिभाव के साथ पहाड़ पर चढ़ाई करते हैं. पूर्णागिरि को पुण्यगिरि के नाम से भी जाना जाता है. यहां से काली नदी निकल कर मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है और वहां पर इस नदी को शारदा के नाम से जाना जाता है.

पर्यटनः
पूर्णागिरि जाने के लिए आप सड़क मार्ग या रेल मार्ग भी चुन सकते हैं. यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन टनकपुर है, जो यहां से करीब 20 किमी दूर है. टनकपुर से ठुलीगाड तक करीब 14 किमी सड़क मार्ग के जरिए पहुचा जा सकता है. यहां का नजदीकी हवाई अड्डा करीब 121 किमी दूर पंतनगर एयरपोर्ट है. जो नानकात्था और खटीमा के रास्ते यहां तक पहुंचता है.

सुविधाएंः
यहां अस्पताल, पोस्ट ऑफिस, टेलीफोन, मेडिकल स्टोर आदि सामान्य सुविधाएं उपलब्ध हैं. यहां का नजदीकी पेट्रोल/डीजल पम्प टनकपुर में है और बाकी सभी साधारण सुविधाओं के लिए टनकपुर सबसे नजदीकी जगह है.