‘सूरज… बहुरूपिया कहीं का, मुझे फंसा दिया’

मैंने पहाड़ उतरना शुरू ही किया था और मुझे ये अनुमान हो गया था कि मुझे गांव पहुंचने से पहले अंधेरा हो ही जाएगा. इस घने जंगल वाले पहाड़ से ठीक नीचे वो घास वाला पहाड़ और उस से ठीक नीचे दाहिने हाथ को तिरौनी है (नैनीताल से 70 किलोमीटर ऊपर, मुक्तेश्वर के पास एक छोटा सा पहाड़ी गांव) विक्रम (जिस मित्र के आमंत्रण पर मैं मुक्तेश्वर गया था.) से मैं सुबह यह कहकर निकला था कि बस अभी आया. कैमरा और बैग लेकर निकल पड़ा था. घास की तलाश के बहाने पहाड़ घूमती-फिरती घसियारनों के साथ बतियाते-बतियाते पता ही नहीं चला कि कब सूरज ढलने लगा था. दिन की तीखी धूप अब गुलाबी होने लगी थी.

मुझे लगा कि अब लौटना ही होगा, वरना मेरी खैर नहीं और बिना बताये चले आने पर घर में सुनने को तो मिलेगा ही.

मैंने तेजी से वो जंगलों वाला पहाड़ पार कर लिया. नीचे के पहाड़ पर मैं जरा सा दाहिने मुड़ा ही था कि रुक गया. कैसे रुका नहीं जनता. पैर वहीं के वहीं जम गए थे जैसे. सामने वाले बर्फीले पहाड़ों के ऊपर बादलों में आग लगी थी. सामने का पूरा आसमान नारंगी रंग में रंगा था और बाकी नीला इतना साफ नीला था कि मुझे यह बात सच लगी कि आसमान के उस पार कुछ भी नहीं. अगर कुछ होता तो उस दिन दिख गया होता.

सूरज और पहाड़ के बीच के बादलों के कोने आग से चमक रहे थे. मुझे लगा कि कोई शरारती पहाड़ी बालक कहीं इन बादलों में आग तो नहीं लगा आया चुपके से. और ये बेखबर बस तैर रहे हैं इधर से उधर. आदमी की तरह. जिसके भीतर ना जाने कितना कुछ जल रहा होता है और वो फिर भी भाग रहा होता है कहीं और किसी और आग के पीछे. जैसे ये बादल अपनी आग से बेपरवाह बहे चले जा रहे थे सूरज कि तरफ. सूरज पहाड़ के बिकुल सिर पर जा खड़ा हुआ. मानो अधिकार हो उसका.

अब मेरे उस पहाड़ और सूरज के बीच कुछ था, तो वो थी वो पहाड़ी नदी जो तरौनी के उत्तर से बहती है. मैंने नदी में देखा तो एक बार लगा कि कोई पिघलता हुआ लोहा तो नहीं बहा आया है नदी में. पानी कहां गया? नदी एक संतरी रंग की लकीर सी दिखने लगी. ये कैसा माया जाल है. मुझे इस वक्त सूरज एक बहरूपिये सा लगता है. पल-पल ऐसे रंग बदलता है मानो कोई छोटा सा बालक जिद पर अडा हो. मैं तो बस इतना जनता हूं कि ये सूरज बहुत भुलक्कड़ है, उसे बस इतना ही याद रहता है सुबह पहाड़ के पीछे से बिना नहाये धोये उठ आना और शाम को बिना बताये पोटली उठाई और निकल अड़े. बंजारे सा सूरज.

मेरे सिर के पीछे से सैकड़ों चिड़िया एक साथ निकलीं. अरे इन्हें कौन डाकिया चिठ्ठी दे आया कि लौट चलो अपने घर- कोई राह ताकता होगा. सूरज तो डूबने वाला है. कौन होगा इतना माहिर डाकिया? चिड़ियों की उस मीठी आवाज से आकाश भर गया. कितना पवित्र है सब कुछ, सैकड़ों चिड़िया, इस आसमान से गुजर गयीं. आसमान फिर भी उतना ही साफ है. और कहीं से सौ लोग गुजर जाएं तो वहां इतनी पवित्रता क्यों नहीं होती?

सूरज का रंग गहराने लगा था. किसी भी पल वो पहाड़ के पीछे से कूदकर आत्महत्या कर लेगा. मुझे यही लग रहा था. बड़ी तेजी से रंग, रूप बदलता है. जैसे कोई बड़ा ही कुशल चित्रकार अपनी कूचियां लेकर बैठा हो. जो हर पल एक नया कैनवास सामने रख देता है.

रंग गहराने लगे जंगलों के, घास के, पहाड़ की उस ऊपरी लकीर का रंग जो उसे आसमान से अलग करती है. मैं विचार शून्य हूं. सूरज को देख रहा हूं जैसे अभी और जीना चाहता है. अंतिम समय में भी जीवन भर की सुख संतुष्टि के चिन्ह साफ-साफ उसके चेहरे पर हैं. साफ-साफ. और बादलों से आखिरी बात करना चाहता है. जैसे सबसे बेहतरीन दोस्त से दूर जाने से पहले कुछ कहना चाहता हो.

अचानक कहां गया सूरज. आत्महत्या या नियति? आसमान और गहराया तो नारंगी से सुर्ख सिन्दूरी हो गया. मैं वहीं बैठ जाता हूं. देखना चाहता हूं वो जीवन के चिन्ह जो जहां-तहां बिखरे पड़े हैं. सोचता हूं कि दुनियां को जीवन देने वाला क्या अपने अंतिम समय में इतना निसहाय हो जाता है कि अंतिम सांस भी न ले सके. क्या हम सबके साथ यही होता है. फिर मैं और सूरज अलग कैसे हुए. दोनों ही तो असहाय हैं.

मुझे होश आया तो मैं अंधेरे से घिरा था. मैं उठा और सोचा कल सुबह इस सूरज से पूछूंगा कि क्या मिला मुझे इस माया जाल में फंसाकर…

कहानी- राहुल चौधरी “नील”