कविता: शब्दों का समंदर…

देख उस पार!
क्या बवंडर है ..
ये तो तेरी मेरी,
आरजू का अंतर है ..

ज़िन्दगी एक सी मिली-
तो क्या हुआ !
ये तो तेरी मेरी,
आबरू का अंतर है ..

पानी सा प्रवाह –
बहता गया दिलों में,
अब क्यूं कहते हो कि
ये जात का अंतर है? ..

मौला ने दिया जब-
लिबाज़ एक ही, जिस्म का !
फिर आज क्यूं रंग बिरंगी-
ओढ़नी का अंतर है ..

मैं अमीर होता अगर –
गरीब न होता कोई !
ये तेरी मेरी भूल या –
समझ का अंतर है ..

रहम नहीं मरहम लगा,
अब ज़ख्मों को सबके,
ये ही अब सभी के,
ख्वाबों का अंतर है …

फ़क़त इश्क कि
बारिश मै भीगता चल…
यहीं उस नूर के,
शब्दों का समंदर है …

देख उस पार!
क्या बवंडर है ..
ये तो तेरी मेरी,
रूह का अंतर है ..

लेखक – प्रदीप चन्द्र पाठक 

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