पौड़ी जिले में धार्मिक पर्यटन स्थल

धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन के लिहाज से पौड़ी जिला काफी समृद्ध हैं. यहां हर तरफ एक से बढ़कर एक भव्य और पुरातात्विक महत्व के मंदिर दिखाई पड़ते हैं.

पौड़ी शहर और आसपास मंदिर:

कंडोलिया देवता:
जिला मुख्यालय पौड़ी शहर के करीब ही है कंडोलिया देवता का यह मंदिर. कंडोलिया देवता को यहां भूमि देवता के रूप में पूजा जाता है. यहां श‍िव की कंडोलिया देवता के रूप में पूजा होती है.
कितनी दूर: पौड़ी शहर से करीब 2 किमी दूर है कंडोलिया देवता का यह मंदिर. हालांकि पैदल जाने पर यह सिर्फ एक किमी दूर है.
क्यों जाएं: सैर-सपाटे के लिए पौड़ी आने वाले पर्यटक कंडोलिया देवता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते. इसके अलावा स्थानीय लोगों के तो कंडोलिया देवता अराध्य हैं ही. मंदिर के पास में ही खूबसूरत पार्क और खेल परिसर भी मौजूद हैं. मंदिर से कुछ ही मिनटों की दूरी पर एश‍िया महाद्वीप का सबसे बड़ा स्टेडियम रांसी है.

बिनसर महादेव:
समुद्र तल से करीब 2480 मीटर की ऊंचाई पर है बिनसर महादेव की यह भूमि.
कितनी दूर: यह पौड़ी शहर से करीब 114 किलोमीटर दूर है. यहां जाने के लिए पौड़ी से करीब 96 किमी दूर थैलीसैंण तक सड़क है. थैलीसैंण से करीब 18 किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है.
क्यों जाएं: बिनसर महादेव का मंदिर भगवान हरगौरी, गणेश और महिषासुरमंदिनी के लिए खास तौर पर प्रसिद्ध है. महा जाता है कि महाराजा पृथु ने अपने पिता बिन्दु की याद में यह मं‍दिर बनवाया था. इसी लिए इस मंदिर को बिंदेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है.

ताराकुंड:
समुद्र तल से करीब 2200 मीटर की ऊंचाई पर है ताराकुंड. यह बेहद खूबसूरत और आकर्षक जगह है.
कितनी दूर: पौड़ी शहर से ताराकुंड करीब 8 किमी दूर है.
क्यों जाएं: ताराकुंड को देखकर आपको सपने में देखी सबसे खूबसूरत जगह भी फीकी लग सकती है. समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर होने के कारण यहां से आस-पास के मनमोहन नजारे आसानी से दिखते हैं. एक छोटी सी प्राकृतिक झील और यहां मौजूद बहुत पुराना मंदिर इस जगह को खास बनाते हैं और इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं.

दूधातोली
समुद्रतल से 3001 मीटर की ऊंचाई पर दूधातोली स्वतंत्रता सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की धरती है.
कितनी दूर: यहां पहुंचने के लिए अंतिम बस स्टैंड थैलीसैंण में है. थैलीसैंण से करीब 24 किमी का ट्रैक पर्यटकों को दूधातोली तक पहुंचाता है. यह बिनसर से करीब 12 किमी दूर है.
क्यों जाएं: यहां आसमान अक्सर साफ नीला दिखाई देता है, जबकि बर्फ से ढकी चोटियां यहां की स्काईलाइन बनाती हैं. यह धरती महान स्वतंत्रता सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की स्वप्न स्थली भी है. उनकी याद में हर साल 12 जून का यहां एक बड़े मेले का आयोजन होता है.

क्यूंक्लेश्वर महादेव:
अपनी पौड़ी यात्रा के दौरान हिन्दू धर्म के पुनरुद्धार के लिए शंकराचार्य ने 8वीं सदी में इस शिव मंदिर की स्थापना की.
कितनी दूर: यह मंदिर पौड़ी शहर में ही है.
क्यों जाएं: पौड़ी और आसपास के क्षेत्रों में इस मंदिर की बहुत मान्यता है. यह श‍िव परिवार का मंदिर है यानी यहां भगवान श‍िव, पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की अराधना की जाती है. यहां से हिमालय की बर्फ से ढकी चाटियों के नजारे तो होते ही हैं, साथ ही अलकनंदा घाटी और पौड़ी शहर भी बड़ा ही खूबसूरत नजर आता है.

नागदेव:
चीड़ और बुरांश के घने जंगलों के बीच यह नागदेव मंदिर है. इस नागदेव मंदिर की बहुत मान्यता है.
कितनी दूर: पौड़ी बस अड्डे से करीब 5 किमी दूर बुबाखाल रोड पर यह मंदिर है. पौड़ी से करीब डेढ़ किमी की पैदल यात्रा करके भी यहां पहुंच सकते हैं.
क्यों जाएं: मंदिर में नागदेवता से आशीर्वाद लेने के अलावा यहां के खूबसूरत नजारों का भी लुत्फ लेने पहुंचते हैं पर्यटक. मंदिर के रास्ते में एक वेधशाला (ऑब्जरवेटरी) है, जहां से हिमालय की चौखंबा, गंगोत्री पर्वत मालाओं, बंदरपूंछ, केदारडोम और केदारनाथ के विशाल और रोमांचकारी दृश्य नजर आते हैं.

ज्वाल्पा देवी:
jwalpa_devi

ज्वाल्पा देवी एक शक्ति पीठ है और यह देवी दुर्गा को समर्पित है.
कितनी दूर: जिला मुख्यालय पौड़ी से ज्वाल्पा देवी की दूसरी करीब 33 किमी है. यह पौड़ी-कोटद्वार सड़क पर स्थ‍ित है. करीब 17 किमी दूर सतपुली यहां का नजदीकी बाजार है.
क्यों जाएं: नवालिया यानी नायर नदी के दाहिने छोर पर ज्वाल्पा देवी के मंदिर में स्थानीय लोगों की असीम आस्था है. हर साल दो बार चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र में यहां मेलों का आयोजन होता है. नवरात्रों में यहां लोग दूर-दूर से मां की अराधना करने पहुंचते हैं. कहा जाता है कि ज्वाल्पा मां अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं.  भी यहां हैं.

कांडा:
यह बेहद खूबसूरत और शांत जगह है. यहां पर सदियों पुराने मंदिर और मूर्तियां हैं.
कितनी दूर: पौडी शहर से करीब 44 किमी दूर है डेलचौरी गांव. डेलचौरी गांव से करीब 1 किमी की चढ़ाई पर कांडा मंदिर हैं.
क्यों जाएं: यह जगह श्रीनगर-डेलचौरी रोड पर स्थ‍ित है. खूबसूरत और शांत जगह है कांडा. यहां पर 10वीं-11वीं सदी की सूर्य की मूर्ति है. 11वीं-12वीं सदी की उमा-महेश की मूर्तियां, 12वीं सदी की लक्ष्मी-नारायण मूर्त‍ियां, 12वीं-13वीं सदी की विष्णु मूर्ति भी यहां है.

देवल:
पौड़ी तहसील के सितांसू पट्टी में देवल समूह के मंदिर हैं और इन्हें वशनाव मंदिर भी कहा जाता है.
कितनी दूर: जिला मुख्यालय पौड़ी से देवल करीब 14 किमी दूर है.
क्यों जाएं: देवल समूह के इन मंदिरों में कुल 12 मंदिर हैं. समय के अनुसार इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है. इनमें से पहला समूह 18वीं-19वीं सदी के मंदिर हैं, जिनमें लक्षमण और शिव के मंदिर हैं. जबकि दूसरा समूह इससे काफी पुराना है. इस समूह के मंदिर 11वीं से 15वीं सदी में बने हैं.
…………………………………………………………………………………………………….

श्रीनगर  और आसपास मंदिर

श्रीनगर कई ज्ञात और अज्ञात महान ऋष‍ियों, साधु-संतों की तपस्थली रही है. यह समूचे गढ़वाल के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है. श्रीनगर और आसपास के क्षेत्रों में कई मंदिर व मठ हैं.

कमलेश्वर महादेव मंदिर:
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने यहां श‍िव की पूजा की थी. राम ने यहां कमल के फूलों से श‍िव की अराधना की. पौराण‍िक खातों के अनुसार यह बहुत प्रचीन मंदिर है.
कितनी दूर:
क्यों जाएं: कहा जाता है कि जब भगवान राम यहां पर श‍िव की अराधना कर रहे थे तो श‍िव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए कमल का एक फूल यहां से गायब कर दिया. तब भगवान राम कमल के एक फूल की जगह अपनी एक आंख देने को तैयार हो गए थे. राम की भक्ति की प्रसन्न होकर भगवान श‍िव ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें सुदर्शन चक्र से नवाजा.

शंकर मठ:
शंकर मठ को ठाकुरद्वारा भी कहा जाता है. सन 1894 में आयी भीषण बाढ़ में ही यह मंदिर जस का तस बना रहा, हालांकि इसका निचला हिस्सा टनों मलवे से भर गया था.
कितनी दूर: यह मठ पुराने श्रीनगर शहर में ही मौजूद है और मुख्य शहर से करीब तीन किमी दूर है.
क्यों जाएं: इस मंदिर के निर्माणकर्ताओं के बारे में मतभेद है, लेकिन केदारखंड में देवल ऋष‍ि और राजा नहुष का वर्णन है जिन्होंने यहां घोर तप किया था. सन 1670 में फतेहपति शाह द्वारा जारी एक ताम्र-पत्र के अनुसार उस समय धर्माधिकारी शंकर धोमाल ने यह जमीन खरीदी और राजमाता की आज्ञा से यहां पर एक मंदिर का निर्माण कराया. मंदिर में एक बड़ा सा मंडप है. इसमें कोई खंभा नहीं है और यह तत्कालीन पत्थर वास्तुकला का एक नायाब उदाहरण है.

गुरु गोरखनाथ:
शंकर मठ के ठीक पीछे पहाड़ी ढलान पर एक बड़े से पत्थर पर गुरु गोरखनाथ ने तपस्या की थी, यहीं पर उनकी अपने श‍िष्यों से पहली बार मुलाकात हुई थी.
कितनी दूर: यह शंकर मठ के ठीक पीछे पहाड़ी ढलान पर है.
क्यों जाएं: यहां पर एक छोटे से रास्ते से लगभग रेंगते हुए पहाड़ के अंदर गुरु गोरखनाथ की गुफा में जा सकते हैं. यहां उनकी एक तस्वीर भी लगाई गई है और मंदिर के ट्रस्टी इसकी देखरेख करते हैं. इस मंदिर में गोरख पंथ के साधु पूजा-पाठ करते हैं. आदि गुरु शंकराचार्य को लगा कि इस गुफा में श‍िव अराधना करना बेहतर होगा, इसलिए यह जगह साधना के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है.

केशो राय मठ:
दक्ष‍िण भारत के एक नारायण भक्त केशो राय ने बद्रीनाथ तीर्थयात्रा का निश्चय किया, लेकिन तब उनकी उम्र काफी ज्यादा हो चुकी थी. 2100 फ‍ुट की ऊचाई पर जाकर वे थक गए और उन्होंने यहीं पर विश्राम करने का निर्णय लिया. यह जगह जगह अलकनंदा नदी के पूर्वी छोर पर स्थित है.
कितनी दूर: श्रीनगर शहर में ही यह जगह अलकनंदा नदी के पूर्वी छोर पर स्थ‍ित है.
क्यों जाएं: जब केशो राय यहां विश्राम कर रहे थे तो उनके सपने में स्वयं भगवान नारायण आए और उन्होंने केशो से उस जगह को खोलने के लिए कहा, जहां वो लेटे हुए थे. जब केशों ने उस जगह को खोदा तो वहां से भगवान नारायण की एक मूर्ति निकली. बाद में उसी जगह के इर्द-गिर्द मंदिर का निर्माण हुआ और भगवान नारायण को मंदिर में स्थापित किया गया.

धारी देवी मंदिर:
अलकनंदा नदी के किनारे धारी देवी का यह मंदिर मां काली को समर्पित है और यहां पहाड़ी अंचल में इनकी बहुत मान्यता है.
कितनी दूर: धारी देवी का मंदिर श्रीनगर से करीब 15 किमी दूर दिल्ली-नि‍ति राष्ट्रीय राजमार्ग-55 पर है, जो बद्रीनाथ को जाता है. सड़क से करीब 1 किमी का सीमेंट किया हुआ रास्ता धारी देवी के मंदिर तक पहुंचा देता है.
क्यों जाएं: यहां के लोगों की मान्यता है कि मंदिर में पत्थर से बनी मां की मूर्ति दिन के अलग-अलग प्रहर में रूप बदलती हैं. कहा जाता है कि मूर्ति का चेहरा सुबह बालिका, दोपहर को युवा महिला और देर शाम वृद्ध महिला की तरह दिखता है. यहां मंदिर के पास ही एक प्राचीन गुफा भी मौजूद है.

राज-राजेश्वरी, देवलगढ़:
मां राज-राजेश्वरी यानी दुर्गा मां का यह मशहूर मंदिर 16वीं सदी में बना. देवलगढ़ में बना यह मंदिर दा-मंजिला है.
कितनी दूर: यह मंदिर सड़क मार्ग से 17 किमी दूर बुघनी-श्रीनगर रोड पर है. अब भी 9 किमी का पुराना पैदल रास्ता बचा हुआ है और कुछ लोग इसी रास्ते से माता के दर्शन करने जाना पसंद करते हैं.
क्यों जाएं: मां का आशीर्वाद लेने के लिए बड़ी संख्या में यहां श्रृद्धालु पहुंचते हैं. हालांकि मंदिर का कुछ हिस्सा अब ढह गया है, लेकिन इसका विशेष म‍हत्व है. 14वीं सदी में कांगड़ा के राजा देवल ने देवलगढ़ की स्थापना की थी. यहां पर भगवान सत्यनारायण और भैरव की भी मूर्तियां हैं.

नीलकंठ महादेव मंदिर:
यह मंदिर पौराणिक महत्व का है और इस जगह का नाम भगवान श‍िव नाम पर पड़ा है.
कितनी दूर: यह मंदिर ऋष‍िकेश से करीब 32 किमी और राम झूला और स्वर्गाश्रम से भी सिर्फ 22 किमी दूर है.
क्यों जाएं: पौराण‍िक कथाओं के अनुसार भगवान श‍िव ने समुद्र मंथन से निकले विष को यहीं पर ग्रहण किया था, इससे उनका गला (कंठ) नीला पड़ गया. इसके बाद उनका नाम नीलकंठ पड़ गया और उन्हीं के नाम पर यह जगह भी नीलकंठ कहलाती है.

ताड़केश्वर महादेव मंदिर:
लैंसडाउन में मौजूद ताड़केश्वर महादेव का यह मंदिर भगवान श‍िव को समर्पित है.
कितनी दूर: यह मंदिर छावनी शहर लैंसडाउन से करीब 36 किमी दूर है.
क्यों जाएं: लैंसडाउन की सैर करने वाले ज्यादातर पर्यटक भगवान श‍िव का आशीर्वाद लेने के लिए इस मंदिर में जरूर जाते हैं. यह मंदिर चारों ओर से घने देवदार और चीड़ के जंगल से घिरा है. प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह बहुत ही शानदार है. श‍िवरात्रि के दिन यहां विशेष पूजा होती है.
………………………………………………………………………………………………

कोटद्वार और आसपास के मंदिर व धार्मिक स्थान

श्री कोटेश्वर महादेव मंदिर:
समुद्र तल से करीब 1428 मीटर की ऊंचाई पर श्री कोटेश्वर महादेव मंदिर की संतानहीन दम्पतियों में बड़ी मान्यता है.
कितनी दूर:
क्यों जांए: इस मंदिर में एक श‍िवलिंग मौजूद है. किवदंती के अनुसार यहां एक महिला ने खुदाई कर रही थी और इस दौरान गलती उनके औजार (कुदाल) से श‍िवलिंग पर चोट लगी. तब एक दिव्य आवाज सुनाई दी और उसी दिव्य आवाज के कहने पर स्थानीय लोगों ने यहां पर श‍िव मंदिर बना दिया.

कान्‍वाश्रम:
मालिनी नदी के किनारे स्थित कान्वाश्रम का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है. यह कान्वा ऋष‍ि का आश्रम है और पर्यटन व धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण जगह है.
कितनी दूर: कान्वाश्रम कोटद्वार से करीब 14 किमी दूर है.
क्यों जाएं: मान्यता है कि महान ऋष‍ि विश्वामित्र ने यहां घोर तपस्या की थी. देवादिदेव इंद्र विश्वामित्र की तपस्या से चिंतित थे, इसलिए उन्होंने अपनी अपसरा मेनका को उनकी तपस्या भंग करने के लिए यहां भेजा. इंद्र अपने मंसूबे में सफल रहे और मेनका ने ऋष‍ि विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दी.

लालढांग:
कोटद्वार-हरिद्वार मुख्य सड़क पर ही बाजार के बीच में यह श‍िव मंदिर है.
कितनी दूर: पौडी जिले के कोटद्वार तहसील में ये मंदिर कोटद्वार से करीब 27 किमी दूर है.
क्यों जाएं: इस श‍िव मंदिर के गर्भगृह में अदभुत पंचयत्न श‍िवलिंग की आकृति है. इसे यहां करीब 2 किमी दूर पांडुवाला से लाया गया है. 9वीं सदी की इस आकृति शिवलिंग आकृति के आसपास ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और उमा-महेश की आकृतियां उकेरी गई हैं.