आया सुन्दर बसंत बनके हम सबका मेहमान

पुलकित हुआ आज धरती का आंगन।
नवसृजित कोपलें कर रही मां शारदे का अभिनदंन।।
क्यों न करें इस धरा का गुणगान।
आया सुन्दर बसंत बनके हम सब का मेहमान।।

नव पुलिकत इस धरा पर उमंग देखो छायी है।
चारों तरफ खुशियों ने ली फिर अंगड़ाई है।।
नभ यूं नीचे देख रहा मानो।
उसकी नवबधू आज फिर से इठलायी है।।

चारों तरफ खुशियां हैं, नयी कलियां रंगरलियां हैं।
पतझड़ वाले पेड़ों पर भी आज फिर से कलियां हैं।।
खेतों में हरियाली है, जीवन में हर्षोल्लास है।
झूमो इस बसंत में तुम भी यह बसंत का उल्लास है।।