‘हमारी जड़ें आज भी उसी बाखेली में हैं’

जहां हम छोड़ आये अपना बचपन,
घर तो आज भी वहीं है।
पर उस घर में रहने वाला कोई नहीं है,
जो हमारे पूर्वजों ने 100 साल पहले बनाया था।

आज भी बुबु लाठी के सहारे चलते हैं,
पर बगल में चलने वाला कोई नहीं है।
आमा घुटने के बल आज भी पटागण लीपती हैं,
पर उसमें खेलने वाले नाती-नतिनी कोई नहीं हैं।

वो गोठ-देहली के ऊपर आज भी डाला टंगा है,
पर उसमें मड़ुआ, धान, झुंगर लाने वाला कोई नहीं है।
वो बंजर खेत आज भी राह देखते हैं किसी की आने की,
पर उसमें हल जोतने वाला कोई नहीं है।

वहां आज भी हम ज्यों का त्यों वैसी ही छोड़ आये,
जो हमारे पूर्वजों ने सेहज कर रखा था।
बस उसको देखने वाला कंधे पर बैग लेकर शहर की तरफ बढ़ गया है।
रह गए तो बस ये वीरान घर और वो सूखे खेत खलिहान,
वो पंगडंडी जहां हम अडू, पिट्ठू और आइस-पाइस खेला करते थे।

कुछ कमियां तो हम में भी हैं,
जो कभी अपने हक के लिए लड़े नहीं।
बस बड़ों का ये सुनकर चुप हो गए
कि हम तो सिद्ध-साध आदिम भया।

आज यही बात सबको न जाने क्यों खलती है,
शायद अपने हक के लिए एकजुट होकर लड़ा होता,
तो इस परदेश में किसी की नौकरी नहीं कर रहे होते।
और यूं उस बाखेली को याद करके आंसू नहीं बहाने पड़ते।