दिल्ली हथ‍ियाई, 2017 में उत्तराखंड की चढ़ाई को तैयार AAP

दिल्ली में जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को ‘शून्य’ और बीजेपी को तीन सीटों पर समेट दिया है, उससे उत्तराखंड की राजनीति में उथल-पुथल मच गई है. सन् 2000 में जबसे उत्तराखंड राज्य बना है, तभी से बीजेपी और कांग्रेस में ही जनता विकल्प तलाशती रही है. बारी-बारी से यही दो पार्टियां राज्य की सत्ता पर काबिज होती रही हैं.

उत्तराखंड आंदोलन में जी-जान से लड़ने वाले लोगों ने ‘उत्तराखंड क्रांति दल’ के रूप में विकल्प बनने की कोश‍िश तो की, लेकिन चुनौती बाहर की बजाय अंदर से ज्यादा मिली. अंतर्कलह के कारण पार्टी छिन्न-भिन्न हो गई और कभी भी राज्य में विकल्प नहीं बन पायी, अलबत्ता पार्टी के दो-चार विधायक कभी बीजेपी सरकार को समर्थन देते हैं तो कभी कांग्रेस सरकार को.

दिल्ली में जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने बीजेपी और कांग्रेस के सूरमांओं को पटखनी दी है, उसने उत्तराखंड में भी विकल्प की राजनीति की संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं. उत्तराखंड क्रांति दल से तो AAP जैसे प्रदर्शन की उम्मीद उनके घोर प्रशंसक को भी नहीं होगी, लेकिन सियासी पंडितों का मानना है कि AAP की उत्तराखंड यूनिट अब और भी ज्यादा शक्तिशाली हो जाएगी. हो भी क्यों नहीं, उसे दिल्ली में केजरीवाल सरकार से ऊर्जा जो मिलेगी.

दिल्ली के नतीजों ने राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस की पेशानी पर तो बल ला ही दिए हैं, साथ ही मोदी लहर के भरोसे 2017 की चुनावी जंग जीतने का दंभ भरने वाली बीजेपी के आत्मविश्वास को भी डिगा दिया है. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी को मिली बंपर जीत का उत्तराखंड की राजनीति पर क्या असर होगा.

जिस तरह से दिल्ली की जनता ने विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी को चुनकर अगले पांच साल के लिए उसे अपना भाग्य विधाता बना दिया है, उससे राज्य में भी वैकल्पिक सियासत की संभावनाएं परवान चढ़ने लगी हैं. उत्तराखंड में संगठनात्मक रूप से कमजोर और बिखरी आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली की जीत ने जमीन तैयार कर दी है. दिल्ली के भरोसे अब AAP पहाड़ पर चढ़ाई के मंसूबे पाल सकती है और उसने दिल्ली में जिस तरह का प्रदर्शन किया है, उसके बाद तो उसे इसका पूरा हक भी है.

अब पार्टी उत्तराखंड में अपने पांव जमाने की ओर बढ़ सकती है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि AAP के स्थानीय नेता अब प्रदेश संगठन को आकार देकर मुद्दों पर आधारित राजनीति का रोडमैप तैयार कर रहे हैं. पार्टी 2017 विधानसभा चुनाव में मजबूत दस्तक देने की तैयारी कर रही है. लोकसभा चुनाव में मिली हार से सबक लेकर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस पर काम शुरू कर दिया था. दिल्ली चुनाव के कारण उत्तराखंड में प्रदेश कार्यकारिणी का गठन रुका हुआ था.

AAP के प्रदेश प्रभारी के तौर पर प्रोफेसर आनंद कुमार के नेतृत्व में सभी जिलों में बैठकें हो चुकी हैं. AAP के लिए बड़ी चुनौती उत्तराखंड में नेतृत्व के तौर पर चेहरा तलाशना है. पार्टी के नेताओं का कहना है क‌ि मिशन 2017 के लिए पार्टी इसी साल से जनता के बीच उतर आएगी.