दो महान हस्तियां जब भी मिलती हैं तो उसका फल हमेशा अच्छा ही मिलता है. कुमाऊं के प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी, कवि व लेखक स्वर्गीय गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ और गढ़वाल के प्रसिद्ध गायक नरेंद्र सिंह नेगी जब एक मंच पर आए तो एक ऐसा गीत सुनने को मिला, जो नई उम्मीदें जगाता है, नए रास्ते खोलता है.

नरेंद्र सिंह नेगी उत्तराखंड के मशहूर लोक गायक हैं, लेकिन उन्होंने अपने ज्यादातर गाने गढ़वाली भाषा में ही गाए हैं. ‘गर्दा’ की कविता को जब उन्होंने अपनी आवाज दी तो यह उनका पहला कुमाऊंनी गीत बन गया.

यह गीत आशावादिता और एकजुटता प्रदर्शित करता है. नरेन्द्र सिंह नेगी ने ‘उत्तराखण्ड रैली मां’ कैसेट में सन् 1994 में यह गाया था. एक उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशान्वित रहने के लिए प्रोत्साहित करने वाले इस गीत में गिर्दा ने आशा व्यक्त की है कि कभी ना कभी तो वो दिन आएगा जब इस काली रात का अंत होगा और एक नया सवेरा जन्म लेगा.

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उत्तराखंड आंदोलन के दौरान यह गाना बेहद हिट रहा और हमेशा आंदोलनकारियों में नया जोश भरता रहा. आप भी सुनें गिर्दा के लिखे और नरेंद्र सिंह नेगी के गाए इस गाने को.