मुख्यमंत्री रावत ने की सेंट्रल हिमालयन काउंसिल के गठन की मांग

नई दिल्ली।… उत्तराखंड से जुड़े ग्रीन बोनस, विशेष राज्य का दर्जा व भागीरथी इको सेंसिटिव जोन जैसे अहम व अनसुलझे मुद्दों को लेकर राज्य सरकार ने एक बार फिर केंद्र के सामने गुहार लगाई. हालांकि, राज्य के लिए ये मुद्दे काई नए नहीं हैं, लेकिन नीति आयोग के रूप में केंद्र की मोदी सरकार की पहल से आशान्वित मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आयोग की बैठक में इन विषयों पर उत्तराखंड का पक्ष जोरदार ढंग से रखा.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नीति आयोग की पहली बैठक में नार्थ इस्टर्न काउंसिल की तर्ज पर सेंट्रल हिमालयन काउंसिल के गठन की मांग उठाई, तो देश की प्रमुख नदियों के उद्गमस्थल उत्तराखंड को वाटर हब के रूप में विकसित करने का अनुरोध भी किया.

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित नीति आयोग की पहली बैठक में मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड के सीमित संसाधनों का हवाला देते हुए राज्य के विशेष दर्जे को बरकरार रखने की मांग की. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के एक अध्ययन के अनुसार उत्तराखंड के वनों से प्रतिवर्ष 16 लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दी जाती हैं.

सकल घरेलू उत्पाद आकलन में ग्रीन एकाउंटिंग को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड जैसे राज्यों को ग्रीन बोनस दिया जाना चाहिए. पूर्व में योजना आयोग के सदस्य बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गठित समिति भी इसकी संस्तुति कर चुकी है.

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को विश्वास में लिए बगैर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने उत्तरकाशी जिले में भागीरथी जलसंग्रहण क्षेत्र (4280 वर्ग किमी) में निर्माण पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी, जिससे लोग पलायन को बाध्य हैं. भागीरथी इको सेंसिटिव जोन की अधिसूचना निरस्त की जानी चाहिए.

मुख्यमंत्री ने कहा, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से लगे उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों में सीमा सड़कों, रेलवे लाइन व हवाई पट्टी जैसे अवस्थापना विकास के कार्य केंद्र द्वारा अपने संसाधन से कराए जाएं. सामरिक महत्व के सीमांत क्षेत्रों के विकास के लिए ट्रांस हिमालयन हाइवे का निर्माण किया जाना चाहिए. देहरादून के जौलीग्रांट एयरपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा व पंतनगर को कार्गो हवाई अड्डे के रूप में विकसित किए जाने की मांग भी मुख्यमंत्री ने की.

हरीश रावत ने कहा कि उत्तराखंड में पर्यावरण के नाम पर कई जलविद्युत परियोजनाएं रोक दी गई हैं या स्वीकृति के लिए लंबित पड़ी हैं. इन लंबित परियोजनाओं पर जल्द निर्णय लिया जाना चाहिए. उत्तराखंड को वाटर हब के रूप में विकसित करते हुए यहां नदी तल व तटों पर भारी मात्रा में एकत्र होने वाली गाद, रेत, बजरी व पत्थर के दोहन को खनन की श्रेणी से बाहर रखा जाना चाहिए. प्रदेश के छोटे शहरों पर आबादी के बढ़ते दबाव के मद्देनजर उन्होंने देहरादून-हरिद्वार व ऋषिकेश में मेट्रो सेवा, रुद्रपुर, किच्छा, पंतनगर, हल्द्वानी, काठगोदाम को एकीकृत करते हुए स्मार्ट सिटी योजना में विकसित करते हुए मेट्रो से जोड़ने की मांग की.

Neeti-Aayog

मुख्यमंत्री ने राज्य के शहरों में घूमने के लिए आने वाली आबादी को ध्यान में रखते हुए पेयजल, जेएनएनयूआरएम, स्वास्थ्य व सफाई की योजनाओं के जनसंख्या मानकों में और स्मार्ट सिटी के चयन के मानकों में छूट देने का भी अनुरोध किया. साल 2016 में अर्धकुंभ की तैयारियों के लिए भी उन्होंने केंद्र सरकार से वित्तीय मदद की अपेक्षा की.

उन्होंने कहा, डिजीटल इंडिया में उपयोग होने वाले उपकरणों से जुड़े बड़े उद्योग हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर में लगाए जाएं, जो ‘मेक इन इंडिया’ की भावना के अनुरूप होगा. नेशनल ऑप्टिकल फाईबर नेटवर्क के तहत ऑप्टिकल फाईबर के साथ ही सैटेलाइट आधारित कनेक्टिविटी का भी विकल्प रखा जाए.