देहरादून का वर्तमान और इतिहास

देहरादून का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है. प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर देहरादून अनेक प्रसिद्ध शिक्षा संस्थानों के कारण भी जाना जाता है.

देहरादून में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, सर्वे ऑफ इंडिया, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान जैसे कई राष्ट्रीय संस्थान हैं. देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान (FRI), भारतीय राष्ट्रीय मिलिटरी कॉलेज और इंडियन मिलिटरी एकेडमी (IMA) जैसे शिक्षण संस्थान हैं.

देहरादून दो शब्दों देहरा और दून से मिलकर बना है. माना जाता है कि देहरा शब्द डेरा का अपभ्रंश है. सिख गुरु हर राय के बेट राम राय यहां आए तो उन्होंने स्वयं और अपने अनुयायियों के रहने के लिए यहां डेरा बनाया. बाद में इसी डेरे के आस-पास एक बड़े शहर का विकास होने लगा. दून घाटी में होने के कारण डेरादून बाद में देहरादून बन गया. हालांकि कुछ इतिसकारों के अनुसार देहरा शब्द अपने आप में ही पूर्ण है और इसे डेरा का अपभ्रंश मानना गलत है. आज भी हिन्दी और पंजाबी में देहरा शब्द का इस्तेमाल होता है. हिन्दी में देहरा शब्द का अर्थ देवालय या देवग्रह होता है, जबकि पंजाबी में देहरा शब्द का इस्तेमाल मंदिर, गुरुद्वारे या समाध‍ि के अर्थों में किया जाता है. इसी तरह माना जाता है कि दून शब्द दूण से बना है और दूण संस्कृत के द्रोणि‍ शब्द का अपभ्रंश है. संस्कृति में द्रोण‍ि का अर्थ दो पहाड़ों के बीच की घाटी है. माना तो यह भी जाता है कि यह द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य का डेरा था.

देहरादून का गौरवशाली इतिहास अनेक पौराणिक गाथाओं व विविध संस्कृतियों को अपने आगोश में समेटे हुए है. जनश्रुति के अनुसार लंका विजय के बाद भगवान राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ यहां आकर गुरु वश‍िष्ठ की सलाह पर तपस्या की. भगवान राम ब्राह्मण रावण की हत्या का प्रायश्चित करना चाहते थे. भगवान राम की तपस्या के स्थान पर भरत मंदिर बनाया गया था, कालांतर में इसी मंदिर के चारों ओर ऋष‍िकेश शहर बस गया. पुरातत्व की दृष्टि से भी भरत मंदिर की स्थापना सैकड़ों साल पहले हुई है. स्कंद पुराण के अनुसार यहां तमसा (टोंस) नदी के तट पर आचार्य द्रोण को भगवान शिव ने स्वयं शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया था. कहा तो यह भी जाता है कि एक बार आचार्य द्रोण के बेटे अश्वथामा को भूख लगी थी और वह दूध पीने की जिद कर रहा था, तब श‍िव ने टोंस नदी के तट पर एक गुफा में प्रकट होकर श‍िवलिंग पर दूध गिराकर बालक अश्वथामा की इच्छा पूरी की. माना जाता है कि आज गढ़ी छावनी क्षेत्र में स्‍थ‍ित ‘टपकेश्वर महादेव मंदिर’ वही गुफा है.

महाभारत काल में दूहरादून के पश्चिमी इलाके का राजा विराट था और उसकी राजधानी विराटगढ़ थी. महाभारत कालीन विराट में वर्तमान में कालसी भी शामिल है. पांडवों ने अपना अज्ञातवास विराट में ही बिताया था, यहां एक मंदिर भी है और कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना पांडवों ने की थी. यहां यमुना नदी के किनारे कालसी में अशोक के शिलालेख भी प्राप्त हुए हैं, जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह क्षेत्र काफी सम्पन्न रहा होगा. 7वीं सदी में इस क्षेत्र को सुधनगर के नाम से जाना जाता था और चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहां की यात्रा की थी. यही सुधनगर बाद में कालसी के नाम से जाना जाने लगा.

स्कंद पुराण के अनुसार देहरादून जिले के ऋष‍िकेश में भगवान विष्णु ने दैत्यों से परेशान ऋष‍ियों की प्रार्थना पर मधु-कैटभ जैसे राक्षकों का संहार किया और यह भूमि ऋष‍ियों को सौंप दी. पुराणों में देहरादून जिले की जिन जगहों को रामायण और महाभारत काल से जोड़ा गया है, उन जगहों पर प्राचीन मू्र्तिया, मंदिर और उनके भग्नावशेष मिले हैं. इन मूर्तियों, मंदिरों और भग्नावेशेषों का कालखंड दो हजार साल पहले या उसके आसपास है.

अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां विराट में अपना समय बिताया, जबकि महाभारत की लड़ाई के बाद भी पांडवों का इस क्षेत्र पर व्यापक प्रभाव रहा. हस्तिनापुर के शासकों के अधीन शासकों के रूप में सुबाहु के वंशजों ने यहां राज किया.

कालसी के पास ही हरिपुर में राजा रसाल के समय के भग्नावशेष भी मिले हैं. देहरादून क्षेत्र में महमूद गजनवी, 168 में तैमूरलंग, 1757 में रुहेला सरदार नजीबुद्दौला और 1785 में गुलाम कादिर ने हमले किए. इसके बाद 1815 तक करीब दो दशक तक यहां गोरखों का क्रूर शासन रहा. 1815 में अंग्रेजों ने गोरखों को यहां से खदेड़ दिया और इसे ब्रिटिश शासन में ले लिया. अंग्रेजों ने देहरादून को एक तहसील के रूप में सहारनपुर जिले में मिला दिया. 1825 में देहरादून को कुमाऊं क्षेत्र में मिलाया गया और 1828 में देहरादून व जौनसार बावर को एक अलग डिप्टी कमिश्नर के अंतर्गत लाया गया. 1829 में देहरादून जिले को कुमाऊं मंडल से हटाकर मेरठ मंडल में शामिल किया गया. 1842 में देहरादून को एक बार फिर सहारनपुर जिले में मिला दिया गया. 1871 में देहरादून को एक अलग जिला बनाया गया. आजादी के बाद 1968 में देहरादून को मेरठ मंडल से हटाकर गढ़वाल मंडल में मिलाया गया. इस बीच 1826-1827 में अंग्रेजों ने लंढोर और मसूरी शहर बसाए, जहां वे आराम करने जाया करते थे.