‘पहाड़ी हूं पहाड़ की बात करता हूं’, एक पहाड़ी नौजवान की डायरी…

चाहे मैं किसी भी शहर मैं रहूं, मैं अंदर से एक पहाड़ी हूं और मेरे रगों मैं पहाड़ी खून दौड़ता है. मेरी हर समय यही कोशिश रहती है कि मैं भी अपनी संस्कृति को एक नाम दूं अपनी बोली, भाषा को एक नई पहचान दूं. मुझे शहर में रहकर भी एक शहरी नहीं बल्कि एक पहाड़ी बन कर अपने पहाड़ को आगे ले जाना है.

वो पहाड़ जहां मेरा जन्म, भरण-पोषण हुआ, जहां मैंने जिंन्दगी का सफर तय किया. जहां से हिमालय की बर्फीली पहाड़ियों को देखा जा सकता है. वहां मेरा बचपन बीता है. मैं कैसे भूल सकता हूं उस जगह को जहां से मुझे इतना प्यार मिला. मेरा बचपन एक साधारण परिवार में गुजरा है, उस घर से जहां सुबह शाम मडुवे की रोटी और दिन में भात भट्ट की चूंटकानि से गुजारा होता है.

मेरे घर परिवार की दिनचर्या आज भी उसी तौर तरीके से चलती है, जैसे सालों पहले हमारे पूर्वज बताकर गए हैं. आज भी तांबे के फुंगव में पानी पीते हैं, आज भी सुबह उठकर सबसे पहले कौवे को रोटी दी जाती है. घर में कोई कुर्सी लगाकर या डाइनिंग टेबल पर खाना नहीं खाता.

हमारे यहां लकड़ी का चौक होता है और उसमें बैठकर खाना खिलाया जाता है. वो चौक भी अलग-अलग प्रकार के बने होते हैं. घर के छोटे सदस्यों के लिए छोटे चौक और बड़ों के लिए बड़े चौक. हमारे घर का खाना आज भी उसी चूल्हे में पकता है. मैं पालक का काफ और भट्ट के डुबकों का बड़ा दीवाना हूं, जब भी कभी घर जाता हूं तो अपने पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद जरूर लेता हूं.

अपने बारे में लिखना और कहना मेरे लिए एक मुश्किल काम है, फिर भी एक कोशिश लाजमी है. मेरा बचपन जिला अल्मोड़ा में बीता. बचपन से लिखने का मन करता था पर लिख नहीं पाता था, आज एक कोशिश करता हूं अपनी संस्कृति के बारे में कुछ न कुछ लिखूं.
काफी लोगों ने मुझे इस कार्य के लिए प्रेरित किया और मैं उन सभी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं और आज जब लिखने बैठता हूं तो मेरा मन सीधा उन पहाड़ियों में चला जाता है, जहां मैं भी गाय-बच्छियों को लेकर ग्वाला जाया करता था. वहां शाम होते ही नोव पर पानी भरने जाता था. आज बेहद खुशी महसूस होती है कि मुझे यह मौका तो मिलता है कि मैं पहाड़ के बारे में लोगों को बता सकूं. मैं उन सब पहाड़ी भाई लोगों का धन्यवाद करता हूं. आप लोग मुझे हर पल सहयोग देते हैं.

श्याम जोशी
‘रंगीलो कुमाऊं, छबीलो गढ़वाल’