‘पहाड़ का पानी और जवानी’ तो काम आए नहीं, अब केंद्रीय मदद पर भी बाबू कुडली मारकर बैठ गए

देहरादून।… एक कहावत है कि ‘पहाड़ का पानी और जवानी, पहाड़ के ही काम नहीं आते.’ अब इस पानी और जवानी की तरह ही केंद्र से मिलने वाले करोड़ों रुपये भी पहाड़ के काम नहीं आते. लगता है कहावत अपना स्वरूप बदल रही है. उत्तराखंड को विशेष राज्य का दर्जा हासिल है और इसी विशेष दर्जे के नाम पर केंद्र सरकार से राज्य को मिलने वाली मदद भी अब उत्तराखंड का भला नहीं कर पा रही है.

गंगा, यमुना, रामगंगा, काली जैसी जीवनदाय‍िनी नदियां पहाड़ से ही निकलती हैं इसके बावजूद आज भी पहाड़ प्यास से तड़प रहे हैं. बिजली को तरस रहे हैं, जबकि मीलों-मील घाटियों को झील बनाकर बिजली बनाई जा रही है. यहां आवाजाही के लिए परिवहन सेवाओं से महरूम स्थानीय लोग मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं. पहाड़ी क्षेत्र के बाशिंदों के लिए बुनियादी जरूरतों की चाह रेत का घरौंदा बनकर रह गई है.

हर किसी की चाहत है पहाड़ का पानी और यहां की जवानी पहाड़ के काम आए. शायद यही कारण है कि पहाड़ की जवानी का पलायन रोकने के लिए बेतरतीब शहरों को रहने लायक और खुशनुमा बनाने के लिए केंद्र सरकार से मिले खास दर्जे के बूते जिस केंद्रीय मदद पर भरोसा टिकाया गया, वह पानी और जवानी की ही तरह उत्तराखंड के हाथ से साल-दर-साल फिसल रही है. राज्य सरकार और प्रशासन विशेष दर्जे और राज्य के विकास के लिए किस हद तक चिंतित हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चालू वित्तीय वर्ष में केंद्रीय मदद का सिर्फ 26.79 फीसदी ही अब तक खर्च हो पाया है.

केंद्रपोषित योजनाओं (सीएसएस) और बाह्य सहायतित योजनाओं (इएपी) के लिए चालू वित्तीय वर्ष के 10305 करोड़ रुपये में से अब तक सिर्फ 2761.73 करोड़ रुपये खर्च हो पाए हैं. बुनियाद ढांचा खड़ा करने के लिए मिलने वाली बाकी सात हजार करोड़ की धनराशि को इस साल के बचे हुए दो महीने से भी कम समय में कैसे खर्च किया जाएगा, यह सवालों के घेरे में है.

उत्तराखंड में केंद्रीय योजनाओं के रूप में मिलने वाली करोड़ों रुपये की मदद को लेकर जितनी जैसी सियासत होती आयी है, उतनी ताकत इस धनराशि को इस्तेमाल करने पर भी होती तो भूख-पानी, बिजली और बुनियादी जरूरतों के लिए तरसते पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों की किस्मत बदल जाती और यहां मायूसी से काफी हद तक निजात मिल जाती. चालू वित्तीय वर्ष के अपडेट सरकारी आंकड़े उन क्षेत्रों में भी मौजूदा सरकार की नाकामी की चुगली कर रहे हैं, जिन्हें कांग्रेस के एजेंडे के प्रमुख क्षेत्रों में शुमार किया जाता है. कांग्रेस सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर रहने वाले अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक, समाज कल्याण, ग्रामीण विकास, पंचायतें और खेती जैसे क्षेत्रों में केंद्रीय योजनाओं में मिली धनराशि का बहुत कम इस्तेमाल हुआ है.

सीएसएस और इएपी में मिलने वाली धनराशि के खर्च की तस्वीर यही नुमायां कर रही है. चालू वित्तीय वर्ष में 31 दिसंबर, 2014 तक सीएसएस के कुल बजट 7615.53 करोड़ में से सिर्फ 2156.97 करोड़ यानी 28.32 फीसद राशि खर्च हुई. इएपी के हालत तो और भी ज्यादा खराब हैं. इस साल के बजट 2689.57 करोड़ में सिर्फ 604.76 करोड़ खर्च हो पाए जो महज 22.49 फीसदी है. सामाजिक क्षेत्र की हालत यह है कि नौ महीने में सीएसएस में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जनजाति के लिए मिली धनराशि से अब तक सिर्फ 8.08 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 23.69 फीसदी बजट का ही इस्तेमाल किया जा सका.

महिला कल्याण, पंचायत, उद्योग जैसे महकमों के लिए मिली सीएसएस की राशि का उपयोग तो दूर खर्च के लिए उसे मंजूरी तक नहीं मिल पाई. ग्राम्य विकास में सीएसएस में 34.38 फीसदी तो इएपी में महज 2.57 फीसदी धन योजनाओं के जरिए जमीन पर उतर पाया. इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि पेयजल को पहाड़ की अधिकतर आबादी तरस रही है, लेकिन सीएसएस में महज 23.63 फीसदी और इएपी में 15.09 फीसदी धन ही उपयोग में लाया गया. सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए मिली धनराशि अभी 31 फीसदी भी खर्च नहीं हुई. शिक्षा, खेल, युवा कल्याण, पर्यटन विकास, शहरी विकास की हालत भी बदतर ही है.

बजट सीएसएस इएपी
कुल 7615.53 2689.57
खर्च 2156.97 604.76

(बजट खर्च के आंकड़े-31 दिसंबर, 2014)

विभिन्न क्षेत्रों में सीएसएस और इएपी में खर्च धनराशि (फीसदी में)

सेक्टर सीएसएस इएपी
अल्पसंख्यक 8.02
अनुसूचित जनजाति 8.08
अनुसूचित जाति 23.69
पेयजल 23.63 15.09
शहरी विकास 0.33 18.25
माध्यमिक शिक्षा 20.79
तकनीकी शिक्षा 4.48
युवा कल्याण 1.93
लोनिवि 40.38
चिकित्सा 37.84
ग्राम्य विकास 34.38 2.57
परिवहन 36.63
समाज कल्याण 19.36