इतिहास के सुनहरे पन्नों में पिथौरागढ़

पिथौरागढ़ शहर के करीब ही एक गांव में मछली और घोंघे के जीवाश्म पाये गए हैं. इससे अंदाजा लगाया जाता है कि पिथौरागढ़ का इलाका हिमालय के निर्माण से पहले एक विशाल झील रहा होगा. काफी लंबे समय तक पिथौरागढ़ में खस वंश का शासन रहा है. खस वंश को ही यहां के कोट बनाने का श्रेय जाता है. पिथौरागढ़ के इर्द-गिर्द भटकोट, डूंगरकोट, उदयकोट तथा ऊंचाकोट कुल चार कोट हैं.

पिथौरागढ़ का वर्णन तो अलग-अलग नामों से पुराणों में भी मिलता है. हालांकि उस काल से जुड़े कोई सबूत आज मौजूद नहीं हैं. लेकिन जो बात आज भी सर्वज्ञ है वो ये कि कैलाश मानसरोवर की यात्रा के दौरान श्रद्धालु पिथौरागढ़ में विश्राम करते हैं. यह श्रद्धालुओं के आराम करने की जगह है. ऋगवेद और स्कंद पुराण में भी इस बात का जिक्र है कि यहां कुछ जनजातियां उस काल में रहती थीं. शायद वही लोग होंगे, जिन्होंने इस इलाके में सबसे पहले रहना शुरू किया होगा.

पिथौरागढ़ के नामकरण को लेकर अलग-अलग राय हैं. एटकिंस के अनुसार, चंद वंश के एक सामंत पीरू गोसाई ने पिथौरागढ़ की स्थापना की थी. ऐसा लगता है कि चंद वंश के राजा भारती चंद के शासनकाल (वर्ष 1437 से 1450) में उनके बेटे रत्न चंद ने नेपाल के राजा दोती को परास्त कर सोर घाटी पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद 1449 में इसे कुर्मांचल में मिला लिया. रत्न चंद के शासन काल में ही पीरू या पृथ्वी गोसाई ने पिथौरागढ़ नाम से यहां एक किला बनाया और बाद में किले के नाम पर ही इस जगह का नाम पिथौरागढ़ पड़ गया.

पिथौरागढ़ के इतिहास के पहले पन्ने जो सामने आते हैं, उनमें महान राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान का नाम भी आता है. इतिहासकारों के अनुसार जब पृथ्वीराज चौहान ने अपने राज्य का विस्तार किया तो उन्होंने इस इलाके को अपने राज्य में मिला लिया और इस क्षेत्र को ‘राय पिथौरा’ नाम दिया. राजपूतों के शासन का यह नियम रहा है कि वो जिस इलाके पर कब्जा करते थे उसका नाम खुद रखते थे. आगे चलकर चंद वंश और कत्यूरी राजाओं के काल में यह नाम पृथीगढ़ हो गया. बाद में मुगलों के शासन काल में उनकी भाषा की दिक्कतों के चलते इसका नाम पिथौरागढ़ पड़ गया.

पिथौरागढ़ में अलग-अलग समय में कई राज वंश के राजाओं ने राज किया. पृथ्वीराज चौहान से पहले इस इलाके पर खस वंश के राजाओं का शासन चलता था. पृथ्वीराज चौहान के बाद 1364 में यहां कचूड़ी वंश (पाल-मल्लासारी वंश) का उदय हुआ. 14वीं सदी के अंत तक पिथौरागढ़ पर कचूड़ी वंश के राजाओं ने राज किया. इस दौरान कचूड़ी वंश के तीन राजाओं ने यहां राज किया और उनका राज्य विस्तार पिथौरागढ़ से लेकर अस्कोट तक फैला था.

1420 के एक ताम्रपत्र के अनुसार कचूड़ी वंश के बाद पिथौरागढ़ पर नेपाल के ब्रह्म वंश का राज हुआ, लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं चला. इसके कुछ ही समय बाद एक बार फिर कचूड़ी वंश के राजाओं ने पिथौरागढ़ को अपने कब्जे में ले लिया. 16वीं सदी में चंद वंश का उदय हुआ और 1790 में उन्होंने अपनी ताकत दिखाने के लिए यहां एक शानदार किले का निर्माण कराया. इसी किले में आज पिथौरागढ़ का गर्ल्स इंटर कॉलेज है.

गोरख‍ियाली कहे जाने वाले गोरखों ने चंद्र वंश के राजाओं को परास्त करके समूचे कुमाऊं-गढ़वाल पर अपना कब्जा जमा लिया. 1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने शोषण के पर्याय बन चुके गोरखों को यहां से खदेड़कर कुमाऊं को अपने कब्जे में ले लिया. अंग्रेजों ने पिथौरागढ़ को एक तहसील के रूप में अल्मोड़ा जिले में शामिल कर दिया. आजादी के बाद 1960 तक पिथौरागढ़ एक तहसील के रूप में अल्मोड़ा जिले का ही हिस्सा रहा. 1960 में इसे अलग जिला बनाया गया. ब्रिटिश काल से जुड़ी कई यादें जैसे कैंट, चर्च, मिशनरी स्कूल आदि आज भी पिथौरागढ़ में हैं, हालांकि इनमें से कुछ अब 1997 में इसी जिले से अलग हुए चंपावत जिले में हैं.

सूखा पड़ने पर यहां आज भी मोस्ता देवता को संतुष्ट करने के लिए समुदाय के लोग धन इकट्ठा करके यज्ञ का आयोजन करते हैं. यहां लोगों का मनना है कि यज्ञ से खुश होकर मोस्ता देवता यहां बारिश अवश्य करते हैं. मोस्ता देवता कोई और नहीं बल्कि भगवान शि‍व ही हैं, उन्हें नेपाल में इसी नाम से पुकारा जाता है. पिथौरागढ़ का संबंध पांडवों से भी है. अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान पांडव इस इलाके में भी आए थे. पिथौरागढ़ में पांडु पुत्र नकुल को समर्पित एक मंदिर भी है, जिसका नाम नकुलेश्वर मंदिर है.