पौड़ी ज़‍िले के मेले और धार्मिक आयोजन

त्योहार, मेले और धार्मिक आयोजनों का मतलब एक-दूसरे से मिलने और खुश‍ियां मनाना भी है. पुराने समय में जब संचार और परिवहन की आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं, तब मेले और त्योहार ही समाजिक संबंध, दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने-जुलने के प्रमुख साधन और स्थान थे.

दूरदराज के इलाकों में इन्हीं मेले-त्योहारों में लोग एक-दूसरे से मिलते-जुलते थे और यहीं पर समस्त आर्थिक गतिविध‍ियां होती थीं. इन मेलों, त्योहारों और धार्मिक आयोजनों का खास महत्व होता है और इनमें सामाजिक संदेश भी होता है. यहां आयोजित होने वाले ज्यादातर धार्मिक आयोजनों का पौराण‍िक महत्व है.

मकर सक्रांति या गिंडी मेला:
हर साल जनवरी के महीने में लोहड़ी के अगले दिन ‘मकर सक्रांति’ का आयोजन होता है. इसे ‘उत्तरायणी’ भी कहा जाता है और गढ़वाल के पहाड़ों में इसे ‘ख‍िचड़‍िया सक्रांति’ भी कहते हैं. उत्तरायणी के दिन उड़द के दाल की ख‍िचड़ी बनायी जाती है और इस दिन ब्राह्मणों को चावल और उड़द दाल दान भी किया जाता है. इस दिन जिले के दादामंडी, थलनाड़ी आदि जगहों पर गिंडी मेलों का आयोजन होता है.

बसंत पंचमी:
‘बसंत पंचमी’ को पौड़ी में ‘श्रीपंचमी’ भी कहा जाता है. इस दिन ‘क्षेत्रपाल’ और ‘भूमिया’ देवता की पूजा होती है. इस दिन ‘थड़िया’ और ‘चौफुला’ जैसे लोक संगीत की भी शुरुआत होती है.

विशुवत सक्रांति:
विशुवत सक्रांति के साथ ही हिन्दू नव वर्ष की शुरुआत होती है और इस दिन को ‘विखोती’ के रूप में मनाया जाता है. पोखाल की त्रिवेणी और देवलगढ़ आदि जगहों पर इस दिन मेलों का आयोजन होता है.

वैकुंठ चतुर्दशी, श्रीनगर:
हिन्दू कलेंडर के अनुसार कार्तिक महीने की शुक्ल चतुर्दशी को वैकुंठ चतुर्दशी भी कहा जाता है. इस दिन श्रीनगर के कमलेश्वर महादेव मंदिर में मेले का आयोजन होता है. यह मेला ना सिर्फ मनोरंजक होता है, बल्कि इसका पारंपरिक महत्व भी है. वैकुंठ चतुर्दशी की रात यहां कई संतानहीन जोड़े दीया जलाकर संतान प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं.

बिनसर मेला:
कार्तिक पूर्ण‍िमा और वैकुंठ चतुर्दशी के मौके पर दो दिन के बिनसर मेले का आयोजन होता है. यह मेला जिले के सीमाई क्षेत्र में चौथान पट्टी और दूदातोली जंगलों के बीच बिंदेश्वर महादेव मंदिर में लगता है. मेले में पौड़ी के अलावा, चमोली, अल्मोड़ा और रुद्रप्रयाग जिलों के लोग भी भगवान श‍िव की अराधना करने पहुंचते हैं.

भुनखान कलिंगा मेला:
गढ़वाल में कई मेलों और धार्मिक आयोजन होते हैं जिनमें पशुबलि दी जाती है. हालांकि इसे अब एक बड़ा वर्ग सामाजिक बुराई मानता है और कानूनन भी इस पर रोक लगाई गई है. लेकिन यहां के लोगों का मानना है कि पशुबलि से स्थानीय देवी-देवता खुश होते हैं.

इसी तरह से होली, दीपावली, श‍िवरात्रि, विजयदशमी, रक्षाबंधन आदि को यहां पूरे धूम-धाम से मनाया जाता है.