पौड़ी में सैर सपाटे के लिए यहां जाएं

पौड़ी जिले में हर ओर प्राकृतिक सुंदरता बिखरी हुई है. यहां बर्फ से ढकी चोटियों के बेहद खूबसूरत नजारे हैं तो गहरी-शांत मन मोह लेने वाली घाटियां भी हैं.

पौड़ी जिले में ग्लेश‍ियर के सुंदर दृश्य हैं तो बुग्याल की खूबसरती और नदियों का शोर भी है. इसके अलावा यहां की कला-संस्कृति, मंदिरों में शंख और घंटियों की मुधर आवाज के अलावा पक्ष‍ियों का कलरव भी यहां खूब सुनाई देता है. यहां वन्य जीवों की भरमार है. इन सब को जोड़ा जाए तो कहा जा सकता है कि पौड़ी सैर-सपाटे के शौकीनों के लिए गागर में सागर समेट कर पेश करता है.

पौड़ी शहर

मध्य हिमालय में कंडोलिया के खूबसूरत पर्वत श्रृंखला के उत्तरी दिशा वाले ढलान पर पौड़ी शहर बसा है. यह समुद्र तल से करीब 1650 मीटर की ऊंचाई पर है. सन 1840 में पौड़ी शहर को गढ़वाल जिले का मुख्यालय बनाया गया था और आजादी के बाद 1969 में इसे गढ़वाल मंडल (डिवीजन) का मुख्यालय घोषित किया गया.
कितनी दूर: यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन कोटद्वार यहां से 108 किमी दूर है. यहां से 155 किमी दूर देहरादून जिले में जोल ग्रांट एयरपोर्ट पौड़ी का नजदकी हवाई अड्डा है.
क्यों जाएं: पौड़ी से हिमालय की बर्फ से ढकी बंदरपूछ, गंगोत्री श्रृंखला, केदारनाथ, चौखंबा, नीलकंठ, हाथीपर्वत, नंदादेवी और त्रिशूल जैसे चोटियों का खूबसूरत नजारा दिखता है. यहां सर्दियों में बहुत ज्यादा ठंड और बर्फ पड़ती है, मानसून के मौसम में यहां बारिश भी खूब होती है. गर्मियों में पौड़ी का मौसम सुहावना बना रहता है.
शहर में कंडोलिया देवता, लक्ष्मी नारायण मंदिर, क्यूंकलेश्वर महादेव और हनुमान मंदिर यहां के मुख्य प्रार्थना स्थल हैं. हर साल कंडोलिया देवता मंदिर के प्रांगण में एक विशाल भंडारे का आयोजन होता है और पौड़ी व आसापास के गांवों के हजारों लोग इसमें शामिल होते हैं.

कोटद्वार

कोटद्वार पौड़ी जिले का सबसे बड़ा बिजनेस सेंटर है और इस जिले का इकलौता रेलवे स्टेशन भी यहीं पर है. पहाड़ों के लिए जाने वाली सभी जरूरी चीजें इसी कोटद्वार शहर से जाती हैं. इस पहाड़ी जिले में कोटद्वार इकलौता शहर है जो मैदानी इलाके में है. यहां बड़ी मात्रा में उद्योग धंधे हैं.
साल 1953 तक कोटद्वार एक छोटा सा बाजार था और उस समय दुग्गडा पौड़ी का सबसे बड़ा बिजनेस सेंटर था. 1953 में जब कोटद्वार रेलवे लाइन से जुड़कर भारतीय रेल के मानचित्र पर आया तो इसकी काया ही बदल गई. यह बड़े आर्थ‍िक केंद्र के रूप में विकसित हो गया और ज्यादातर बड़े व्यापारिक समूहों ने दुग्गडा छोड़ दिया और कोटद्वार में आकर जम गए.
कोटद्वार में रेलवे स्टेशन तो है, लेकिन हवाई अड्डे की कमीं यहां खलती है. यहां का नजदीकी हवाई अड्डा देहरादून में जोली ग्रांट एयरपोर्ट यहां से करीब 115 किमी दूर है. कोटद्वार शहर में सिद्धबली और दुर्गादेवी के मंदिर हैं. शहर के आसपास कनवाश्रम, भरत नगर, चिला, कालागढ़, मेदनपुरी देवी और श्री कोटेश्वर महादेव मंदिर जैसी जगहें हैं.

लैंसडाउन

समुद्र तल से करीब 1706 मीटर की ऊंचाई पर लैंसडाउन एक मशहूर हिल स्टेशन है. इसका गढ़वाली में असली नाम कालूडांडा है. यह कोटद्वार-पौड़ी रोड पर बसा है और इसका नजदीकी रेलवे स्टेशन कोटद्वार ही है.
कितनी दूर: लैंसडाउन अपने जिला मुख्यालय पौड़ी से करीब 81 किमी दूर है. कोटद्वार से इसकी दूरी सिर्फ 41 किमी है. लैंसडाउन का नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून जिले में करीब 152 किमी दूर जोली ग्रांट हवाई अड्डा ही है.
क्यों जाएं: सन 1887 में लॉर्ड लैंसडाउन ने इस जगह की खोज की थी और उन्हीं के नाम पर इसका नाम लैंसडाउन पड़ गया. अंग्रेज इस हिल स्टेशन को खास पसंद करते थे. जब देश अंग्रेजों का गुलाम था तो यह इलाका ब्रिटिश गढ़वाल का हिस्सा था. यहां के लोगों ने आजादी के लिए खूब जंग लड़ी और लैंसडाउन विरोध के सबसे बड़े गढ़ों में से एक था. मौजूदा दौर में यहां भारतीय सेना की गढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय है.
पर्यटकों के लिए गढ़वाल राइफल्स सेंटर के परेड ग्राउंड में वार मेमोरियल खास आकर्षण का केंद्र है. यहां का सुहावना मौसम पर्यटकों को अपनी ओर खींच लाता है. घने बांज और देवदार के जंगलों से घिरा लैंसडाउन शहर छुट्टियां मनाने के लिए बेहतरीन जगह है.
टिप-एन-टॉप, संतोषी माता मंदिर और चर्च प्वाइंट यहां आकर्षण के केंद्र हैं. लैंसडाउन के आसापास ताड़केश्वर महादेव मंदिर और भैरव गढ़ी मंदिर भी हैं. यहां वार्ष‍िक शरदोत्सव का आयोजन भी होता है.

श्रीनगर

श्रीनगर अलकनंदा नदी के किनारे एक विशाला घाटी में बसा है. अंग्रेजों के गढ़वाल पर कब्जे से पहले एक समय श्रीनगर गढ़वाल के राजा की राजधानी थी. आज इसकी गिनती पौड़ी जिले के सबसे बड़े शहरों में होती है और मशहूर गढ़वाल विश्वविद्यालय भी यहीं पर है. श्रीनगर शहर करीब 8 वर्ग किलोमीटर में फैला है.
कितनी दूर: जिला मुख्यालय पौड़ी से श्रीनगर की दूरी करीब 29 किमी है. यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन करीब 106 किमी दूर ऋष‍िकेश है. देहरादून में जोलीग्रांट एयरपोर्ट भी यहां से करीब 123 किमी दूर है.
क्यों जाएं: चार धाम की यात्रा करने वाले श्रृद्धालुओं के लिए श्रीनगर मुख्य पड़ाव है. एक गढ़वाल के राजा की पारंपरिक राजधानी होने के कारण यह शहर कला, वास्तुकला और हिमालय के आर-पार व्यापार का मुख्य केंद्र था. आज श्रीनगर इस क्षेत्र का व्यापारिक और शैक्षण‍िक हब है.
गर्मियों में यहां अच्छी खासी गर्मी पड़ती है, जबकि सर्दियां ठंडी और कुहासे वाली होती हैं. शहर और उसके आसपास रघुनाथ मंदिर, बुली मंदिर, सत्यनारायण मंदिर, कामसमृदनी मंदिर, कमलेश्वर मंदिर, धारीदेवी, केशो राय मठ, शंकर मठ और बद्रीनाथ मठ आदि हैं.
इतिहास: सन 1804 तक श्रीनगर गढ़वाल के राजा की राजधानी रहा. 1804 में नेपाल से आए गोरखों ने पूरे गढ़वाल पर कब्जा कर लिया और ‘खुदबुद’ (देहरादून) की लड़ाई में राजा की हत्या कर दी. इसके बाद अगले करीब 12 साल तक पूरे उत्तराखंड में गोरखों का क्रूर शासन रहा. 1815 में अंग्रेजों ने गोरखों को यहां से खदेड़ दिया और पूरे क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया. बार-बार की लड़ाईयों, भूकंप और अलकनंदा नदी की बाढ़ आदि के कारण श्रीनगर भी दिल्ली की तरह बार-बार उजड़ा और फिर बसा है. आधुनिक श्रीनगर की शुरुआत 1879 से हुई. यह वही साल था जब श्रीनगर को टाउन यानी शहरी क्षेत्र का दर्जा दिया. हाल के कुछ दशकों में तो श्रीनगर का पूरा नक्षा की बदल गया है.