उत्तरकाशी में सैर सपाटे के लिए यहां जाएं

धार्मिक पर्यटन के लिहाज से उत्तरकाशी का खासा महत्व है. यहीं से भारत की जीवनदायिनी गंगा और यमुना नदियां निकलती हैं और इनके उद्गम स्थल गंगोत्री व यमुनोत्री पर्यटकों और श्रृद्धालुओं के लिए खासा महत्व रखते हैं. इसके अलावा इस भूमि का अपना जबरदस्त इतिहास भी रहा है. यह भूमि पौराणिक काल से मानव को अपनी ओर खींचती रही है, इसलिए यहां सैर-सपाटे व धार्मिक पर्यटन के लिए तमाम जगहें हैं.

उत्तरकाशी

उत्तरकाशी शहर इसी नाम के जिले का जिला मुख्यालय भी है. एक प्राचीन शहर है और इसकी सांस्कृतिक विरासत बेहद समृद्ध है और प्राकृतिक सौंदर्य किसी को भी मोहित कर देता है. यह शहर धार्मिक दृष्टि से खासा महत्वपूर्ण है. मुख्य रूप से यह धरती भगवान श‍िव को समर्पित है.
कितनी दूर: जिला मुख्यालय उत्तरकाशी देश की राजधानी दिल्ली से करीब 380 किमी दूर है. यह ऋष‍िकेश से 143, देहरादून से 190, केदारनाथ से 244 और बद्रीनाथ से करीब 321 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: उत्तरकाशी का सीधे अर्थों में मतलब उत्तर की काशी होता है. उत्तरकाशी का भी महत्व मैदानी काशी (वाराणसी) की तरह ही है. दोनों ही काशी गंगा (भागीरथी) नदी के किनारे पर बसे हैं. जहां उत्तरकाशी स्यालम गाड़ (वरुण) और कालीगाड़ यानी असी नदियों के बीच बसा है, वहीं काशी यानी वाराणसी भी वरुण और असी नदियों के बीच बसा है. उत्तरकाशी और काशी दोनों ही जगह का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र घाट मनिकार्निका घाट है. इसके अलावा दोनों जगह भगवान विश्वनाथ को समर्पित मंदिर हैं.
एंडवेंचर टूरिज्‍म: अगर आप ट्रैकिंग के शौकीन हैं तो उत्तरकाशी में ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ाई का लुत्फ ले सकते हैं. पर्वतारोहण यहां का मुख्य आकर्षण है.

विश्वनाथ मंदिर, उत्तरकाशी
उत्तरकाशी के विश्वनाथ मंदिर की बहुत ज्यादा धार्मिक मान्यता है. यह मंदिर यहां के सबसे पवित्र तीर्थ और पौराण‍िक मंदिर है. यहां मौजूद कई मंदिरों के बीच विश्वनाथ मंदिर का बेजोड़ महत्व है.
कितनी दूर: ऋष‍िकेश से करीब 154 किमी दूर.
क्‍यों जाएं: विश्वनाथ मंदिर के आंगन में ही सामने दायीं ओर शक्‍त‍ि मंदिर है. इस मंदिर में 26 फीट ऊंचा त्रिशूल है, जिसका बेस ही 8 फीट और 9 इंच है. इस त्रिशूल का ऊपरी भाग लो‍हे का और निचला भाग तांबे का है. पौराणिक कथाओं के अनुसार दुर्गा माता ने इसी त्रिशूल से दानवों को मारा था.
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बाड़कोट

यह उत्तरकाशी जिले का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और धीरे-धीरे बाड़कोट का महत्व और भी बढ़ते जा रहा है. खासकर 1990 के दशक में उत्तरकाशी क्षेत्र में आए भयानक भूकंप के बाद से कई मुख्यालयों व अन्य जिला स्तरीय कार्यालयों का बाड़कोट में आना अब भी जारी है.
कितनी दूर: जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से बाड़कोट करीब 68 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: बाड़कोट में यमुनोत्री के रास्ते पर सड़क बन जाने के बाद गढ़वाल के अन्य इलाकों से भी आकर लोग यहां बसने लगे हैं. यमुनोत्री यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्रियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए व्यवसाय‍ियों ने यहां होटलों, ढबों व अन्य सेवाओं को शुरू किया गया.

कुतेती देवी मंदिर:
कुतेती देवी का मंदिर भी नदी के तट पर शहर से कुछ ही दूरी पर एक पुरानी जगह पर है. लेकिन यह बिल्कुल नया सा लगता है. इस मंदिर के मौजूदा पुजारी पिछले 14 पीढ़ियों से यहां पूजा कार्य कर रहे हैं. वे यहां के बारे में एक मजेदार कहानी बताते हैं. कहते हैं.
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गौमुख या गंगोत्री मंदिर

पवित्र गंगोत्री धाम समुद्र तल से 3200 मीटर की ऊंचाई पर है. यह देशभर से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है. यहां कई आश्रम हैं इनमें से कई तीर्थयात्रियों व पर्यटकों को रहने की सुविधा भी प्रदान करते हैं.
कितनी दूर: गंगोत्री मं‍दिर ऋष‍िकेश से 248 किमी दूर है. गंगोत्री से भी 18 किमी दूर गौमुख है.
क्‍यों जाएं: गंगोत्री आने वाले प्रत्‍येक यात्री को यहां जरूर स्‍नान करना चाहिए. गंगोत्री ग्लेश‍ियर से करीब 6 किलोमीटर दूर नंदनवन-तपोवन है. यहां से आसपास बेहद सुंदर नजारे दिखते हैं. गंगा पवित्रता की प्रतीक है और गंगोत्री आकर यहां स्नान करने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है. गंगा हिन्दू संस्कृति में जन्म से मृत्यु तक हर पड़ाव से जुड़ी है. गंगोत्री के गंगा मंदिर का निर्माण गोरखा जनरल अमर सिंह थापा ने करवाया था.
कब जाएं: सर्दी के दिनों में यह क्षेत्र पूरे देश से लगभग कट जाता है. गर्मियों में होने वाली चारधाम यात्रा में गंगोत्री भी एक अहम धाम है.
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यमुनोत्री

बाड़कोट से ही यमुना नदी के किनारे-किनारे सड़क यमुनोत्री की तरफ को जाती है. बाड़कोट में ही कलसी और मसूरी से यमुनोत्री की ओर जाने वाली सड़कें भी मिलती हैं. यहां से हनुमान चट्टी तक गाड़ी जाने लायक सड़क है.
कितनी दूर: यमुनोत्री दिल्ली से करीब 438 किमी, ऋष‍िकेश से 200, देहरादून से 175, बाड़कोट से 40 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यमुनोत्री में यमुना के पानी में स्नान करने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है. यमुनोत्री के रास्ते में हनुमान चट्टी तक गाड़‍ी जाने की सड़क है और यहां के नजारे खूबसूरत हैं. यह सयाना चट्टी से सिर्फ 7 किमी की दूरी पर है. हनुमान चट्टी से यमुनोत्री पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं और यमुनोत्री पहुंचने के लिए 13 किमी की ट्रैकिंग करनी पड़ती है. 3292 मीटर की ऊंचाई पर यमुनोत्री में दो कुंड हैं. इन कुंडों का नाम सूर्य कुंड और गौरी कुंड है.
कब जाएं: सर्दी के दिनों में यह क्षेत्र पूरे देश से लगभग कट जाता है. गर्मियों में होने वाली चारधाम यात्रा में गंगोत्री भी एक अहम धाम है.
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शनि मंदिर, खरसाली
यमुनोत्री रूट पर हनुमान चट्टी से खरसाली पहुंचने के लिए यमुना नदी के दोनों छोरों से दो रास्ते हैं. यहां खरसाली गांव के दोनों ओर यमुना के भाई शनि के दो मंदिर हैं.
कितनी दूर: जानकी चट्टी से करीब 1 किमी, यमुनोत्री से करीब 6.5 किमी और हनुमान चट्टी से करीब 8 किमी दूर है खरसाली.
क्‍यों जाएं: 7000 फीट की ऊंचाई पर खरसाली गांव का एक शनि मंदिर तो काफी ऊंचा है और करीब 5 मंजिल जितना ऊंचा है. यह मंदिर पत्थरों और लकड़ी से बनाया गया है. यह मंदिर बाढ़ और भूकंप रोधी बनाया गया है, लकड़ी के लठ्ठ इसे इस तरह के खतरे से दूर रखते हैं.
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पोखरू देवता मंदिर (नेतवार) कर्ण मंदिर (सारनौल) और दुर्योधन मंदिर (सौर)
पोखरू देवता मंदिर, कर्ण मंदिर (सारनौल) और दुर्योधन मंदिर (सौर) ये तीनों आसपास ही हैं. नेतवार गांव जिसके आसपास 14 किमी के दायरे में ये तीनों मंदिर हैं, वह इलाका बांज, देवदार और चीड़ के पेड़ों से घिरा है. चकराता-श‍िमला रोड़ पर स्थ‍ित तिउनी से नेतवार के लिए रास्ता है.
कितनी दूर: मोरी से नेतवार करीब 12 किमी और चकराता से करीब 69 किमी दूर है. नेतावार में चंद मिनटों की पैदल यात्रा करने पर टोंस नदी किनारे पर पोखू देवता का मंदिर है.
क्‍यों जाएं: पोखरू देवता मंदिर: तिउनी गांव से नेतवार जाने के लिए पर्यटकों को मोरी के रास्ते हर की दून घाटी में जाना पड़ता है. यहां से एक पतली सी पगडंडी रुपेन और सुपेन नदी के संगम तक जाती है, जो आगे चलकर टटनास या टोंस नदी बनती है. यहां रास्ता लंबा पत्थरीला, काई से भरा हुआ और नम है.

कर्ण देवता मंदिर: नेतवार से करीब डेढ़ मील की सीधी चढ़ाई के बाद सारनौल गांव में पहुंचा जा सकता है. यह धरती भुब्रूवाहन नाम के एक महान योद्धा के लिए जानी जाती है. पाताललोक का राजा महाभारत युद्ध हिस्सा बनने धरती पर आया, लेकिन चालाक भगवान कृष्ण को अंदेशा था कि वो अर्जुन को हरा सकता है.  कृष्ण ने चालाकी से युद्ध में भुब्रूवाहन के आने से पहले ही किसी तरह से उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया.

दुर्योधन मंदिर: नेतवार गांव से करीब 12 किमी दूर हर की दून रोड सौर गांव हैं. हालांकि कृष्ण ने महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले ही भुब्रूवाहन का सिर धड़ से अलग कर दिया था, लेकिन उन्होंने युद्ध देखने की उसकी इच्छा का सम्मान किया. कृष्ण ने यहां उसके सिर को एक पेड़ पर टांग दिया और इस तरह भुब्रूवाहन ने महाभारत का पूरा युद्ध देखा.

कर्ण और दुर्योधन तो भुब्रूवाहन के बड़े प्रशंसक थे ही यहां लोग अब भी उसकी वीरता को सलाम करते हैं और उसकी प्रशंसा में गीत गाए जाते हैं. यहां के लोगों ने कर्ण और दुर्योधन के सम्मान में उनके मंदिर बना दिए. कर्ण का मंदिर सारनौल में बना तो सौर में दुर्योधन का मंदिर बनाया गया. इस तरह से दोनों इस इलाके के क्षेत्रपाल बन गए.
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कपिल मुनी आश्रम मंदिर, गुंडियात गांव
पुरोला के उत्तर-पश्चिम में करीब 10 किमी दूर समुद्र तल से 4500 फीट की ऊंचाई गुंडियात गांव हैं. सुंदर घाटी के बीच यह गांव बसा है और यहां की मुख्य फसल आलू है.
कितनी दूर: पुरोला से करीब 10 किमी दूर है गुंडियात गांव.
क्‍यों जाएं: बस स्टॉप से कुछ ही दूरी की पैदल यात्रा करके श्रृद्धालु और पर्यटक कपिल मुनि के आश्रम में पहुंच सकते हैं. कहा जाता है कि यही वह जगह है, जहां कपिल मुनि ने भगवान श‍िव की घोर अराधना की और उनसे वारदान हासिल किया. यहां से करीब 5 किमी दूर राम गांव है और यहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का प्राचीन मंदिर है.
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नेहरू पर्वतारोही संस्थान (NIM):
समुद्र तल से 1300 मीटर की ऊंचाई पर नेहरू पर्वतारोहण संस्थान पहाड़ों के बीच भागीरथी नदी के दक्ष‍िणी छोर पर है. उत्तरकाशी की शान माने जाने वाले इस संस्थान की स्थापना 1965 में हुई थी. यहां पर्वतारोहण की तकनीक सिखाई जाती है. संस्थान सुबह 10 से शाम 5 बजे तक खुला रहता है, लेकिन मंगलवार को बंद रहता है.
कितनी दूर: जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से करीब 5 किमी दूर है नेहरू पर्वतारोही संस्थान.
क्‍यों जाएं: इस संस्थान में कई तरह के कोर्स होते हैं. यहां बेसिक से लेकर एडवांस माउंटेनियरिंग, एडवेंचर, सर्च एंड रेस्क्यू और निर्देश के तरीके सिखाए जाते हैं. इसके अलावा महिलाओं, युवा लड़कों व लड़कियों और गूंगे-बहरों के लिए भी संस्थान में अलग से कोर्स कराए जाते हैं.
एंडवेंचर टूरिज्‍म: यह संस्थान एडवेंचर टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए ही बना है. संस्थान की वेबसाइट www.nimindia.org से यहां के बारे में तमाम जानकारियां जुटाई जा सकती हैं.
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हरसिल

हरसिल की हरियाली और खूबसूरती देखते ही बनती है. यह उत्तरकाशी-गंगोत्री सड़क के बीच समु्द्र तल से करीब 7860 फिट की ऊंचाई पर बसा है. यहां भागीरथी नदी की शांत और अविरल धारा बहती है.
कितनी दूर: उत्तरकाशी से हरसिल करीब 73 किमी दूर है जबकि यहां से गंगोत्री मात्र 25 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: हरसिल की पूरी घाटी में नदी-नालों और झरनों की भरमार है. यहां हर तरफ पहाड़ों से दुध‍िया पानी गिरता हुआ और घाटी के मौन को तोड़ता है. यहां हर तरफ घाटी में देवदार के घने जंगल हैं और सैलानी पेड़ों की छांव में आराम करके थकान मिटाते हैं. यहां से पहाड़ी की ढलानों पर गिरी बर्फ और पर्वत श‍िखरों पर जमी बर्फ शानदार नजारे पेश करती है.
यहां की खूबसूरती फिल्मकारों को भी लुभाती है और राजकपूर की फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में यहां की सुंदरता दुनिया देख चुकी है. गंगोत्री यात्रा के दौरान हरसिल की खूबसूरती देखने के बाद ही राजकपूर को यह फिल्म बनाने का आइडिया आया. मजेदार बात है ये है कि फिल्म के एक सीन में एक्ट्रेस मंदाकिनी को जिस झरने में नहाते हुए दिखाया गया था, तब से उस झरने का नाम ही मंदाकिनी फॉल पड़ गया है.
कब जाएं: अप्रैल से अक्टूबर तक हरसिल आना आसान है लेकिन बर्फबारी के चलते नवंबर से मार्च तक यहां इक्के-दुक्के सैलानी ही पहुंच पाते है.
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गोविंद पशु विहार नेशनल पार्क:
उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत के नाम पर 1955 में इस वन्य जीव अभयारण्य को स्थापित किया गया. करीब 953 वर्ग किमी में बसाया गया यह पशु विहार नेतवार में समुद्र तल से 1439 मीटर की ऊंचाई से बंदरपूंछ चोटी पर 6325 मीटर की ऊंचाई तक फैला है.
कितनी दूर: यहां जाने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट देहरादून में ही है और देहरादून यहां से करीब 190 किमी दूर है. इस नेशनल पार्क में घूमने जाने के लिए यहां का नजदीकी शहर धारकढ़ी यहां से करीब 17 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: यह अपने खूबसूरत और रंग-बिरंगे बुग्याल (घास के मैदानों), घने जंगलों और वन्य जीवन के लिए जाना जाता है. 1990 में इसे नेशनल पार्क घोषित किया गया, जिसके बाद यहां जानवरों को चराने और पेड़-पौंधे काटने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. देवदार, बांज, चीड़, ब्लू पाइन, सिल्वर बर्च और कई प्रकार के फलदार पेड़ों की प्रजातियों की यहां बहुतायत है.
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तिलारी शहीद स्मारक

तिलारी में एक शहीद स्मारक है, जबकि बाड़कोट में एक छोटा स्मारक भी है. तिलारी कांड उत्तरकाशी के इतिहास में एक मत्वपूर्ण और कुख्यात घटना है. हर साल यहां तिलारी दिवस का आयोजन किया जाता है.
कितनी दूर: उत्तरकाशी के दूसरे सबसे बड़े शहर बाड़कोट से तिलारी करीब 11 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: तिलारी कांड 30 मई 1930 को हुआ था जब राजा के कुशासन और उसके सामंती आदेश को मानने की बजाय लोगों ने विरोध का रास्ता अपनाया. टिहरी के राजा की नीतियों के ख‍िलाफ लोग सत्याग्रह कर रहे थे और राजा और उनके प्रधानमंत्री चक्रधर जुयाल ने इस विरोध को जलियांवाला बाग की तरह ही कुचल दिया.
कब जाएं: यहां सामंती आदेश को न मानकर अपने प्राणों की आहूति देने वाले शहीदों के सम्मान में हर साल 30 मई को तिलारी दिवस का आयोजन होता है. उस समय यहां जाना काफी सुखद होने के साथ ही सांस्कृतिक आयोजनों का लुत्फ भी लिया जा सकता है.
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उत्तरकाशी जिले की अन्य सैरगाहें

दायरा बुग्‍याल
समुद्र तल से करीब 10,000 फीट की ऊंचाई पर है दायरा बुग्याल. यहां से हिमालय के शानदार नजारे दिखते हैं. यहां एक छोटी सी झील भी है, जिसका साफ-स्वच्छ पानी अलग ही अनुभव देता है.

केदार ताल
समुद्र तल से करीब 15000 फीट की ऊंचाई पर है केदार ताल. इस ताल में थाल्‍यासागर चोटी की परछाई स्पष्ट नजर आती है. केदार ताल जाने के रास्‍ते में कोई सुविधा नहीं मिलती है, इसलिए यहां पूरी तैयारी के साथ ही जाना चाहिए.

नचिकेता ताल
नचिकेता ताल के चारों ओर खूबसूरत हरियाली बिखरी है. ताल के एक किनारे पर एक छोटा सा मंदिर भी है, कहा जाता है कि संत उदाक के पुत्र नचिकेता ने इस ताल का निर्माण किया था. उन्हीं के नाम पर इस ताल का नाम नचिकेता ताल पड़ गया. ताल के पास ठहरने और खाने-पीने की कोई सुविधा नहीं है.