हरिद्वार का वर्तमान और इतिहास

हरिद्वार आज अपने धार्मिक महत्व से अलग भी पहचान बना रहा है. यह उत्तराखंड के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है और तेजी से विकसित हो रहा है. सिडकुल और भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) हरिद्वार को नई पहचान दे रहे हैं.

प्रकृति प्रेमियों के लिए तो हरिद्वार स्वर्ग से भी सुन्दर है. हरिद्वार की यह भूमि भारतीय संस्कृति के कई रंग दिखाती है. पौराणि‍क कथाओं के अनुसार हरिद्वार को मायापुरी, कपिलस्थान और गंगाद्वार के नाम से भी जाना जाता था. यह उत्तराखंड के पार पवित्र चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार भी है.

महाभारत के वनपर्व में धौम्य ऋष‍ि जेष्ठ पांडुपुत्र युध‍िष्ठिर को भारत के तीर्थ स्थानों के बारे में बताते हैं. इसमें वे गंगाद्वार यानी हरिद्वार व कनखल के तीर्थ स्थलों का भी उल्लेख करते हैं. महान प्राचीन ऋष‍ि कपिल मुनि का आश्रम भी हरिद्वार भूमि में ही था, जिससे हरिद्वार को उसका प्राचीन नाम कपिला यानी कपिलस्थान मिला. पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्यवंशी राजा सगर के प्रपौत्र और भगवान श्रीराम के पूर्वज भगीरथ ने सतयुग में सालों तक तपस्या की.

भगीरथ की इस तपस्या के फलस्वरूप ही गंगा धरती पर आयीं और जिससे उनके 60 पूर्वजों का उद्धार हुआ और कपिल ऋष‍ि के श्राप से मुक्ति भी मिली. यह परंपरा आज भी चली आ रही है. करोड़ों हिन्दू इसे आज भी निभाते हैं और अपने पूर्वजों के उद्धार की उम्मीद में उनकी चिता की राख यहां पवित्र गंगा नदी में प्रवाहित करते हैं. कहा जाता है कि यहां भगवान विष्णु ने एक जगह अपने पैरों के निशान छोड़े हैं, जो हर की पौड़ी में एक ऊपरी दीवार पर स्थापित हैं और उस जगह को पवित्र गंगा हमेशा छूती रहती है.

हर व्यक्ति का इतिहास है हरिद्वार में

हरिद्वार अपने आप में एक ऐसी अनूठी जगह है, जहां आज भी हर व्यक्ति का इतिहास लिखा हुआ मिल जाता है. अपने पूर्वजों के बारे में जानना हो, या अपनी वंशावली का पता करना हो तो हरिद्वार के अलावा शायद ही कोई जगह हो जो आपकी मदद कर सके. प्राचीन रिवाजों के अनुसार हिन्दू परिवारों की पिछली कई पीढ़ि‍यों की विस्तृत वंशावलियां हिन्दू ब्राह्मण या पंडित जिन्हें पंडा भी कहा जाता है द्वारा हरिद्वार में जमा की जाती हैं. ये दस्तावेज हाथ से लिखी हुई पंजियों में हैं, जो उनके पूर्वज पंडितों ने आगे सौंपीं और हर एक के पूर्वजों के असली जिलों व गांवों के आधार पर वर्गीकृत की गईं और सहेजकर रखी गईं हैं.

हर जिले की पंजिका का खास पंडित होता है. यहां तक कि 1947 में देश के विभाजन के बाद जो जिले व गांव पाकिस्तान में रह गए और हिन्दू भारत आ गए उनकी भी वंशावलियां यहां हैं. हालांकि कई खास परिस्थितियों में उन हिन्दुओं के वंशज अब सिख हैं, तो कई के मुस्लिम व ईसाई भी हैं. कोई भी व्यक्ति इन पंडों से अपनी पिछली सात पीढ़‍ियों की जानकारी लेता है तो ये यहां बिल्कुल भी असामान्य बात नहीं है. हिन्दुओं में प्राचीन काल से ही वंशावली के धारक पंडित के पास जाकर पंजियों में उपस्थ‍ित वंश-वृक्ष में संयुक्त परिवारों में हुए सभी विवाहों, जन्मों, मृत्युओं का विवरण सहित नवीनीकृत (रिन्युएशन) कराना एक परंपरा है.