इतिहास के पन्नों में उत्तरकाशी की तारीख

उत्तरकाशी का इतिहास बहुत ही समृद्ध है. यहां पाल वंश-शाह के राजाओं से लेकर इसके अलग राज्य के रूप में उत्तराखंड का हिस्सा बनने तक कई रोचक कहानियां हैं.

उत्तरकाशी जिले का एक भाग बड़कोट एक समय पर गढ़वाल राज्य का हिस्सा था. हालांकि बड़कोट आज उत्तरकाशी का काफी महत्वपूर्ण शहर होता जा रहा है. लेकिन एक समय पर यहां ‘पाल’ वंश का राज था, 15वीं सदी में दिल्ली के सुल्तान संभवत: बहलूल लोदी ने ‘पाल’ को ‘शाह’ नाम में बदल गया. 1803 में नेपाल के गोरखा लोगों ने गढ़वाल पर आक्रमण कर दिया और अमर सिंह थापा को यहां का शासक बना दिया गया. 1814 में गोरखों का अंग्रेजों से सम्पर्क हुआ, दोनों की सीमाएं मिलती थी और सीमा विवाद के कारण अंग्रेजों ने गोरखों पर आक्रमण कर दिया. आख‍िरकार अप्रैल 1815 में अंग्रेजों ने गोरखों को गढ़वाल से खदेड़कर इसे अपने राज्य में मिला लिया.

अंग्रेजों ने गढ़वाल को दो हिस्सों में बांट दिया. उन्होंने पूर्वी गढ़वाल को अपने साथ रखा और इसे ब्रिटिश गढ़वाल कहा जाने लगा, पश्चिमी गढ़वाल अंग्रेजों ने पाल वंश के उत्तराध‍िकारी सुदर्शन शाह को दे दिया. पश्चिमी गढ़वाल को टिहरी गढ़वाल या टिहरी रियासत का नाम दिया गया. 1947 में जब देश अंग्रेजों के शासन से आजाद हुआ तो 1949 में समूचे गढ़वाल को उत्तर प्रदेश राज्य में मिला दिया गया.

उत्तरकाशी जिले की यह भूमि सदियों से भारतीय साधु-संतों के लिए आध्यात्मिक अनुभूति की और तपस्या स्थली रही है. यहां देवताओं ने भी अपना बलिदान दिया है और यहां से बेहतर वैदिक भाषा कहीं नहीं बोली जाती. दुनियाभर से लोग यहां वैदिक भाषा सीखने के लिए आते हैं. महाभारत के अनुसार उत्तरकाशी में ही एक महान साधु जडा भारत ने यहां घोर तपस्या की थी. स्कंद पुराण के केदार खंड में उत्तरकाशी और भागीरथी, जाह्नवी व भीलगंगा के बारे में वर्णन है.

उत्तरकाशी के बाड़कोट शहर की खुदाई में कई कुंड मिल हैं, जिनके आसपास सीढियों के साथ-साथ पत्थर की दीवारें भी बनी हैं. यहां भगवान विष्णु, गणेश और विष्णु के द्वारपाल जय व विजय की मूर्तियां भी मिली हैं. इन मूर्तियों और कुंड का अभी तक ना तो अध्ययन हुआ है और ना ही इन्हें अध‍िकृत किया गया है, इसलिए इनका काल निर्धारण भी नहीं हो सकता. इन खोजों से ये तो पता चलता ही है कि वर्तमान गांव व शहक के अस्तित्व में आने से पहले भी बड़कोट में जीवन था.

पौराणिक काल से ही समय-समय पर गढ़वाल के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आकर बसे. सबसे पहले यहां कोल, कीरत और खस (डोम, भोटिया और खस) लोग आए जो आज ब्राह्मण और राजपूत हैं. यहां समाज की तीन सतहें हुआ करती थीं, लेकिन मध्य युग में भारत के मैदानी इलाकों से यहां पहुंचे लोगों के कारण समाज चार परतों में बंट गया.