पिथौरागढ़ की इन हसीन वादियों की खुशबू बुला रही है

पिथौरागढ़ शहर:
पिथौरागढ़ शहर इसी नाम के जिले का मुख्‍यालय भी है. पिथौरागढ़ का इतिहास बेहद खूबसूरत है और खसी वंश से लेकर, पृथ्वीराज चौहान, कत्यूर, चंद वंश और अंग्रेजों तक इसका इतिहास बेहद हलचल भरा रहा है. यह समुद्रतल से 1615 मीटर की ऊंचाई पर बसा हुआ है. नगर का महत्व चंद वंश के राजाओं के समय से काफी बढ़ गया था.
क्‍यों जाएं: यहां का इतिहास बेहद रोचक है, यहां चंद वंश के राजाओं की निशानी के तौर पर उनका किला है. सुंदर घाटी है और पुरातन धरोहरें हैं. शरद ऋतु में यहां एक ‘शरदकालीन उत्सव’ मनाया जाता है. इस मेले में पिथौरागढ़ की सांस्कृतिक झांकी के दर्शन होते हैं. इसमें सुंदर-सुंदर नृत्यों का आयोजन होता है.
कितनी दूर: पिथौरागढ़ जाने के लिए नजदीकी पंतनगर एयरपोर्ट जिला मुख्यालय से 249 किमी दूर है. नजदीकी रेलवे स्टेशन टनकपुर 151 किमी और काठगोदाम रेलवे स्टेशन 212 किमी दूर है.
इतिहास: पिथौरागढ़ शहर के करीब ही एक गांव में मछली और घोंघे के जीवाश्म पाये गए हैं. इससे अंदाजा लगाया जाता है कि पिथौरागढ़ का इलाका हिमालय के निर्माण से पहले एक विशाल झील रहा होगा. काफी लंबे समय तक पिथौरागढ़ में खस वंश का शासन रहा है.

चंडक:
चंडक सोर घाटी के उत्तर में 7 किमी दूर है. यहां से हिमालय की ऊंची-ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के अलावा सोर घाटी का सुंदर नजारा भी दिखता है. यहां मग्नेसाइट खनन फैक्टरी भी है.
क्‍यों जाएं: हिमालय की ऊंची चोटियों की खूबसूरती और खूबसूरत सोर घाटी की सुंदरता में खोने के लिए पर्यटक यहां पहुंचते हैं. इसके अलावा चंडक से 2 किमी की दूरी पर मस्तमानू मंदिर भी है, जहां दर्शन करके स्थानीय लोग खुद को धन्य मानते हैं.
कितनी दूर: यह जिला मुख्याल से 7 किमी उत्तर की दिशा में है.

थल केदार:
थल केदार भोले भंडारी शिव शंकर के मंदिर के लिए मशहूर है.
क्‍यों जाएं: यहां भक्त भोले बाबा का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं.
कितनी दूर: यह पिथौरागढ़ से 16 किमी दूर है. जबकि द्वज का जयंति मंदिर टोटानौला के रास्ते 21 किमी दूर है.

गंगोलीहाट:
गंगोलीहाट एक धार्मिक महत्व की जगह है. पारंपरिक गीत-संगीत और प्राचीन मान्यताएं यहां की पहचान हैं. यह स्थान महाकाली मंदिर के लिए भी मशहूर है, जहां स्वयं शंकराचार्य ने शक्ति पीठ की स्थापना की है.
क्‍यों जाएं: यहां नवरात्र के दौरान मेले का आयोजन होता है. महाकाली के मंदिर में नवरात्र के दौरान श्रृद्धालु पूजा करने के साथ ही जानवरों की बलि भी देते हैं. यहां से सिर्फ 2 किमी दूर मनकेश्वर मंदिर है और 2 किमी दूर ही अपरारा भी है, जहां मशहूर कवि गुमानी का जन्म हुआ था.
कितनी दूर: गंगोलीहाट जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से करीब 77 किमी दूर है.

पाताल भुवनेश्वर:
समुद्र तल से 1350 मीटर ऊपर बसा बेरीनाग एक गुफा मंदिर है. यहां भगवान श‍िव ने मनुष्य की सहायता करने के लिए गुफा के अंदर एक पूरा संसार बसाया हुआ है.
क्यों जाएं: गुफा मंदिर के अंदर जाने के लिए एक पतली सी गुफा बनी है. यहां जाना अपने आप में रोमांच की पराकाष्ठा है. मुख्य गुफा से नीचे जाने के बाद अंदर कई अन्य गुफाएं हैं. यहां कई हिन्दू देवी-देवताओं की पत्थर की मूर्तियां हैं.
कितनी दूर: यह गंगोलीहाट से करीब 16 किमी उत्तर और बेरीनाग से करीब 20 किमी दक्ष‍िण में है.

बेरीनाग और चौकोड़ी:
बेरीनाग एक बेहद खूबसूरत छोटा सा शहर है. बेरीनाग के ठीक सामने हिमालय के खूबसूरत बर्फ से ढके पहाड़ खड़े दिखते हैं.
क्‍यों जाएं: बेरीनाग से हिमालय का खूबसूरत नजारा तो दिखता ही है, साथ ही यहां के नाग मंदिर, त्र‍िपुरा देवी का मंदिर, कोटेश्वर मंदिर की गुफा और चौकोड़ी के चाय बागान खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं.
कितनी दूर: बेरीनाग जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से करीब 102 किमी दूर समुद्र तल से 1720 मीटर की ऊंचाई पर बसा है. चौकोड़ी बेरीनाग से 11 किमी दूर है.

थल और कोट गढी देवी:
मुंस्यारी और चौकोड़ी (बेरीनाग) के बीच थल एक मुख्य जगह है. दोनों शहरों के बीच गाड़‍ियां यहीं से होकर जाती हैं.
क्‍यों जाएं: बेरीनाग से मुंस्यारी जाने के लिए यही मार्ग है. इसके अलावा यहां एक हथिया मंदिर, सड़क से करीब दो किमी दूर अमिया गांव का अखंड मंदिर भी देखने लायक जगह है. किसी भी व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ हो तो कोट गढी देवी के मंदिर अंतिम अदालत है.
कितनी दूर: थल रामगंगा नदी के किनारे बसा है और यह पिथौरागढ़ से करीब 62 किमी दूर है. यह चौकोड़ी से करीब 23 किमी दूर है.

डीडीहाट:
डीडीहाट की प्राकृतिक खूबसूरती प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचती है. इस इलाके में चंद वंश का राज चलता था.
क्‍यों जाएं: डीडीहाट का सीराकोट किला व मंदिर दर्शनीय स्थल है. यहां अशोक मस्क डीयरा सेंक्चुरी भी है. यहां से हिमालय की पंचाचुली और त्रिशूली चोटियां साफ नजर आती हैं.
कितनी दूर: यह पिथौरागढ़ से करीब 55 किमी दूर, समुद्र तल से 1725 मीटर की ऊंचाई पर बसा है.

मुंस्यारी:
मुंस्यारी बर्फ से ढकी पर्वत श‍िखरों के बीच बसा हुआ है. यह मिलाम, रलाम और नामिक ग्लेश‍ियर जाने के लिए बेस कैंप भी है.
क्‍यों जाएं: हिमालय की चोटियों के दर्शन और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए यह जगह जानी हाती है. अगर आप मिलाम, रलाम और नामिक ग्लेश‍ियर जाना चाहते हैं तो मुंस्यारी यहां जाने के लिए बेस कैंप है.
कितनी दूर: मुंस्यारी जोहारा इलाके के द्वार के रूप में जाना जाता है. यह पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से 154 किमी दूर है और समुद्र तल से 2298 मीटर की ऊंचाई पर बसा है.

धारचुला:
काली नदी के तट पर बसा धारचुला पिथौरागढ़ जिले के बॉर्डर पर है. इस जगह का धार्मिक महत्व है और यहां से नेपाल जाने के लिए सिर्फ काली नदी पर बने पुल को पार करके पर्यटक नेपाल पहुंच जाते हैं.
क्‍यों जाएं: दिनभर के लिए नेपाल जाना हो तो धारचुला सबसे अच्छी जगह है. इसके अलावा यहां की प्राकृतिक खूबसूरती के दीवानों की दुनियाभर में कमी नहीं है.
कितनी दूर: जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से धारचुला करीब 94 किमी दूर है.
इतिहास: नारायण स्वामी ने 1936 में नारायण आश्रम का निर्माण कराया था.

जौलजिबी:
गोरी और काली नदी के संगम पर बसे जौलजिबी में तीन अलग-अलग संस्कृतियों का मिलन होता है. पतझड़ के मौसम में यहां ट्रेड फेयर लगता है, जिसमें यहां की सांस्कृतिक और आर्थ‍िक गतिविध‍ियां साफ दिखती हैं.
क्‍यों जाएं: कैलास मानसरोर रूट पर गुंजी से काली नदी के किराने 10 किमी दूर कालापानी नाम की जगह है. यहां चीड़, भोजपत्र और जूनिपर के घंने जंगल हैं. यहां लिपुलेख पास से काली नदी होकर आती है.
कितनी दूर: जौलजिबी जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से करीब 77 किमी दूर है.
एंडवेंचर टूरिज्‍म: एडवेंचर टूरिज्म के शौकीनों के लिए यहां बहुत कुछ है. पर्यटन विभाग यहां हैंग ग्लाइडिंग, पैरा ग्लाइडिंग की भी अनुमति देता है. चंडक, मुनाकोट और द्वज को ग्लाइ‍डिंग प्वाइंट के रूप में विकसित किया जा रहा है.