धार्मिक पर्यटन की राजधानी चमोली के ये खूबसूरत नजारे…

चमोली सुदूर उत्तरी जिला है और यहां के नजारे हर किसी को अपनी ओर खींचते हैं. फिर चाहे वह खूबसूरत फूलों की घाटी हो यहां, बद्रीनाथ के शानदार मंदिर. सिखों का धार्मिक स्थल हेमकुंड भी इस जिले में है और भविष्य बद्री, आदि बद्री जैसे मंदर भी यहां हैं. प्राकृतिक सुंदरता के इत‍िहास और आध्यात्म के लिए भी चमोली की यह धरती सैलानियों की लिस्ट में सबसे ऊपर जगह बनाती है.

बद्रीनाथ:
भारत के चार प्रसिद्ध धामों में बद्रीनाथ सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है. माना जाता है कि ब्रदीनाथ की स्थापना सतयुग में हुई थी, इसलिए इस धाम का वर्णन और गुणगान लगभग सभी प्रमुख शास्त्रों में पाया गया है. यहां धरती के पालनहार भगवान विष्णु की पूजा होती है, इसलिए इसे विष्णुधाम भी कहा जाता है.
कितनी दूर: बद्रीनाथ दिल्ली से करीब 520 किमी, ऋष‍िकेश से 300, हरिद्वार से 325, देहरादून से करीब 346, जोशीमठ से 46 और औली ग्लेश‍ियर से करीब 60 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: बद्रीनाथ मंदिर ही यहां का मुख्य आकर्षण है. हिन्दू धर्म में चार धाम यात्रा का काफी महत्व है. कहा जाता है कि हर व्यक्ति को अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार चारधाम की यात्रा करनी चाहिए. बद्रीनाथ इन्हीं चार धामों में से एक है.
इतिहास: 9वीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य ने धार्मिक महत्व के इस स्थान को दोबारा बनाया था. बद्रीनाथ की मूर्ति यहां तप्त कुंड के पास एक गुफा में थी और 16वीं सदी में गढ़वाल के एक राजा ने इसे मौजूदा मंदिर में रखा था.
एंडवेंचर टूरिज्‍म: बद्रीनाथ ही नीलकंठ जैसे कई पर्वतारोहण अभियानों का प्रवेशद्वार भी है. यह भारत-तिब्बत (चीन) बॉर्डर से सिर्फ 24 किमी दूर है.
नजदीकी रेलवे स्टेशन: ऋष‍िकेश करीब 297 और कोटद्वार करीब 327 किमी दूर.

हेमकुंड साहिब:
हेमकुंड साहिब समुद्र तल से करीब 15000 फीट की ऊंचाई पर हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के बीच है. यह सिख तीर्थयात्रियों का मशहूर धार्मिक स्थल है.
कितनी दूर: हेमकुंड जाने के लिए यात्रियों को गोविंदघाट पहुंचना पड़ता है जो ऋष‍िकेश से 275 किमी दूर है. गोविंदघाट से 13 किमी की पैदल यात्रा करके श्रृद्धालु घांघरिया गांव पहुंचते हैं. घांघरिया में भी एक गुरुद्वारा है, यहां से 6 किमी लंबे पथरीले रास्ते पर 1100 मीटर की चढ़ाई के बाद हेमकुंड साहिब पहुंचा जा सकता है.
क्‍यों जाएं: हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा सिख धर्म का मशहूर धार्मिक स्थल है. इसके अलावा यहां की प्राकृतिक खूबसूरती और मीलों ट्रैकिंग किसी भी पर्यटक को अपनी ओर खींचते हैं. हेमकुंड में रात को रुकने की व्यवस्था नहीं है, इसलिए पर्यटकों को दोपहर 2 बजे यहां से निकल जाना होता है.

भविष्य बद्री:
भविष्य बद्री का सीधा अर्थ भविष्य के बद्रीनाथ से है. भविष्य बद्री जोशीमठ से लता की ओर करीब 17 किमी दूर सुबेन में है. यह तपोवन से आगे धौलीगंगा नदी के किनारे सड़क मार्ग से करीब 3 किमी दूर पैदल मार्ग पर है.
कितनी दूर: जोशीमठ से 17 किमी दूर.
क्‍यों जाएं: प्राकृतिक खूबसूरती के साथ धौलीगंगा नदी का शोर मचाता दूध‍िया पानी किसी भी प्रकृति प्रेमी का ध्यान आकर्ष‍ित कर सकता है. यहां तपोवन से ऊपर की ओर जाते हुए धौलीगंगा का पानी दोनों ओर लगभग सीधी खड़ी चट्टानों से सैंकड़ों मीटर नीचे गिरते हुए साफ देखा जा सकता है.
धार्मिक महत्व: मान्यता है कि कलियुग के अंत के करीब जोशीमठ में भगवान नरसिम्हा की मूर्ति का लगातार दुबला हो रहा हाथ टूटकर गिर जाएगा और विष्णुप्रयाग के पास पतमिला में जय-विजय पहाड़ ढह जाएंगे, जिससे प्रमुख धाम बद्रीनाथ जाने का रास्ता पूरी तरह से बंद हो जाएगा. इसके बाद बद्रीनाथ की पूजा भविष्य बद्री में होगी.

आदि बद्री:
रेवेन्यू रिकॉर्ड में आदि बद्री को हेलिसेरा भी कहा गया है. आदि बद्री में 16 मंदिरों के खंडहर मिले हैं. इनमें से एक मंदिर में आज भी बद्रीनारायण की पूजा होती है. यह पंच बद्री का भाग है. पंच बद्री के पांच ब्रदी स्थल इस प्रकार हैं: 1. आदि बद्री, 2. विशाल बद्री, 3. योगध्यान बद्री, 4. वृद्ध बद्री और 5. भविष्य बद्री.
कितनी दूर: कर्णप्रयाग से करीब 17 किमी दूर है आदि बद्री. यहां का नजदीकी एयरपोर्ट जौली ग्रांट हवाई अड्डा 210 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: आदि बद्री के ठीक ऊपर एक खूबसूरत सी झील है, जिसका नाम बेनीताल है. आदि बद्री की खूबसूरती भी किसी प्रकृति प्रेमी के लिए स्वपन जैसा हो सकती है. यहां चारों ओर खूबसूरती बिखरी है.
धार्मिक महत्व: मान्यता है कि कुछ सालों बाद आमने-सामने के पहाड़ों के जुड़ने के कारण जोशीमठ से बद्रीनाथ के बीच का रास्ता बंद हो जाएगा. इसके बाद बद्रीनाथ ही पूजा इसी आदि ब्रदी मंदिर में होगी और यह श्रृद्धा का नया केंद्र बन जाएगा.

गोपीनाथ मंदिर:
गोपेश्वर मंदिर में एक बड़ा सा गुंबद और 24 दरवाजे हैं जो एक पवित्र स्थान या आश्रम में खुलते हैं और यह 30 वर्ग फीट में फैला है. मंदिर के आसपास कई खंड‍ित मूर्तियां हैं जो इस बात की ओर इशारा करती हैं कि पुरातन काल में यहां और भी कई मंदिर थे.
कितनी दूर: चमोली से करीब 10 किमी दूर.
क्‍यों जाएं: यहां भगवान भोले भंडारी से जुड़ी कई कहानियां हैं. शिव का वह खंबा यहीं पर आज भी मौजूद है, जो उन्होंने कामदेव को मारने के लिए फेंका था. 5 मीटर ऊंचे इस खंबे में 8 तरह की धातुओं का इस्तेमाल हुआ है, लेकिन सैंकड़ों सालों के इतिहास में इस पर मौसम की मार का कोई असर नहीं हुआ.
धार्मिक महत्व: कहा जाता है कि यहां जो 5 मीटर ऊंचा खंबा है उसका संबंध स्वयं भगवान श‍िव से है. मान्यता ये भी है कि दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत इस खंबे को यहां से हिला नहीं पाती, लेकिन सच्चे श्रृद्धालु के छूने मात्र से यह खंबा डोलने लगता है.

रुद्रनाथ मंदिर या योगध्यान बद्री:
रुद्रनाथ मंदिर या योगध्यान बद्री भी उतना ही पुराना है, जितना स्वयं बद्रीनाथ का मंदिर. यह पंच बद्री का अंग है. यहां भी बद्रीनाथ मंदिर की ही तरह भगवान बद्रीनाथ की योगध्यान में बैठे रूप की पूजा होती है.
कितनी दूर: यह जोशीमठ से करीब 25 किमी दूर पांडुकेश्वर में है.
क्‍यों जाएं: योगध्यान बद्री के दर्शन के लिए श्रृद्धालु बड़ी मात्रा में आते हैं. इसके अलावा यह जगह पांडवों और उनके पिता पांडु से भी जुड़ी है.
धार्मिक महत्व: मान्यता है कि पांडवों ने हस्तिनापुर का अपना राजपाट राजा परीक्ष‍ित को सौंपने के बाद अपने अंतिम कुछ दिन यहां गुजारे थे. इसके अलावा पांडवों के पिता राजा पांडु ने भी अपने अंतिम दिन यहीं गुजारे थे.
इतिहास: यहां कई ताम्रपत्रों पर यहां के इतिहास की झलक मिलती है. इन ताम्रपत्रों पर मंदिर के इतिहास के अलावा शुरुआती कत्यूरी राजाओं के बारे में भी अच्छी जानकारी है.
एंडवेंचर टूरिज्‍म: एडवेंचर टूरिज्म के शौकीन सैलानी मिलाम ग्लेश‍ियर की सैर कर सकते हैं.

औली:
औली ग्लेश‍ियर दुनियाभर के एडवेंचर टूरिस्ट के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है. औली का बुग्याल हर मौसम में पर्यटकों को लुभाता है, लेकिन सर्दियों में औली की ढलानों पर गिरी सफेद बर्फ की चादर मन मोह लेती है.
कितनी दूर: औली सड़कमार्ग द्वारा जोशीमठ से 16 जबकि रोपवे से सिर्फ 4 किमी दूर है. दिल्ली से औली 505 किमी, हरिद्वारा से 289, देहरादून से 316 किमी दूर है
क्‍यों जाएं: यहां से हिमालय पर्वत का बेहद खूबसूरत नजारा दिखता है. यहां से नंदा देवी, कामेट और दूनागिरी जैसे पर्वत साफ नजर आते हैं. आम तौर पर जनवरी से मार्च के बीच औली की ढलानों पर बर्फ की 3 मीटर तक मोटी चादर बिछ जाती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुसार यह स्कीइंग के लिए बहुत अच्छी जगह है. यहां अब विंटर गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया राष्ट्रीय स्तर की चैंपियंनश‍िप भी आयोजित करता है.

वसु धारा:
वाटर फॉल यानी जल प्रपात या झरना हमेशा ही मानव की कल्पनाओं को नए श‍िखर पर ले जाता है. वाटर फॉल की खूबसूरती में खोकर हर कोई उसके नीचे गिरते पानी की बूंदों को महसूस करने लगता है.
कितनी दूर: वसु धारा माणा गांव से करीब 5 किमी दूर है. माणा गांव उत्तर में भारत का आख‍िरी गांव है, यहां से आगे कुछ बर्फ के पहाड़ हैं और दूसरी तरफ तिब्बत जो अब चीन के कब्जे में है.
क्‍यों जाएं: यह कोई आम झरना नहीं है. 145 मीटर की ऊंचाई से गिरता यह झरना हर किसी पर्यटक और प्रकृति प्रेमी का ध्यान अपनी ओर खींचता है. झरने की खूबसूरती के अलावा यहां बर्फ से ढकी चोटियां, ग्लेश‍ियर और चट्टानें हैं.

फूलों की घाटी:
समुद्र तल से 3352 से 3658 मीटर तक ऊपर फूलों की घाटी को वर्ल्ड हैरिटेज घोषि‍त किया गया है. यहां जंगली फूलों की प्रचुरता है. एनीमोन, जर्मेनियम, मार्श, गेंदा, प्रिभुला, पोटेन्टिला, जिउम, तारक, लिलियम, हिमालयी नीला पोस्त, बछनाग, डेलफिनियम, रानुनकुलस, कोरिडालिस, इन्डुला, सौसुरिया, कम्पानुला, पेडिक्युलरिस, मोरिना, इम्पेटिनस, बिस्टोरटा, लिगुलारिया, अनाफलिस, सैक्सिफागा, लोबिलिया, थर्मोपसिस, ट्रौलियस, एक्युलेगिया, कोडोनोपसिस, डैक्टाइलोरहिज्म, साइप्रिपेडियम, स्ट्राबेरी एवं रोडोडियोड्रान व अन्य औषधीय पौंधे इस घाटी की निशानी हैं.
कितनी दूर: गोविंद घाट से करीब 15 किमी. दूर घांघरिया और वहां से करीब 5 किमी दूर फूलों की घाटी तक पैदल ही जाना पड़ता है. यह दिल्ली से 529 किमी, हरिद्वार से 314, देहरादून से 340, औली से 56 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: अगर आपको फूलों से प्यार है. अगर आपको फूलों की खूबसूरती पसंद है और आप इनकी खूशबू व खूबसूरती में खो जाना चाहते हें तो एक बार यहां जरूर आएं. फूलों की घाटी 10 किमी लंबी और 2 किमी चौड़ी है.
धार्मिक महत्व: मान्यता है कि रामायण काल में हनुमान संजीवनी बूटी की खोज में इसी घाटी में पहुंचे थे.
इतिहास: 1931 में इस घाटी का पता सबसे पहले ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक एस स्मिथ और उनके साथी आर.एल. होल्डसवर्थ ने लगाया था. स्मिथ ने 1938 में ‘वैली ऑफ फ्लॉवर्स’ नाम से एक किताब प्रकाशित करवाई.

सतोपंत झील:
शांत-निर्मल पानी की यह त्रिकोणीय झील करीब आधे किलोमीटर की परिध‍ि में फैली है. माना जाता है कि इस त्रिकोणीय झील के तीनों कोनों का संबंध ब्रह्मा, विष्णु और मेहेश (श‍िव) से है.
कितनी दूर: यह बेहद खूबसूरत झील बद्रीनाथ से करीब 25 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: झील का निर्मल शांत पानी एक आलौकिक सुख देता है. यहां बर्फ से ढकी पर्वत मालाओं के बीच सतोपंत झील का साफ पानी एक अलग ही दुनिया में ले जाता है.
एंडवेंचर टूरिज्‍म: यहां तक पहुंचने का रास्ता बेहद खतरनाक लेकिन एडवेंचर से भरा है. यहां बीच में गुफाओं के अलावा कहीं पर भी रुकने या आराम करने, खाना बनाने या आग जलाने की जगह नहीं है.

बेदनी बुग्याल:
समुद्र तल से 3354 मीटर की ऊंचाई पर रूपकुंड के रास्ते में बेदनी बुग्याल वान गांव के पास ही है. बेदनी बुग्याल के बीच में वैतरणी या बेदनी कुंड नाम की एक छोटी सी झील भी है, जहां भक्त अपने पितरों का तर्पण करते हैं.
कितनी दूर: यह दिल्ली से करीब 512 किमी दूर है, जिसमें 20 किमी की ट्रैकिंग भी शामिल है. मई से नवंबर के बीच यहां जाया जा सकता है. बेदनी बुग्याल देहरादून से 270 किमी, अल्मोड़ा से 128, काठगोदाम से 210 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: रूपकुंड की सैर पर जा रहे हैं तो रास्ते में बेदनी बुग्याल मिलता है. यहां की आकर्षक हरी घास और उसके बीच-बीच में सजे जंगली फूल बेदनी बुग्याल की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं.

रूपकुंड:
समुद्र तल से 5029 मीटर की ऊंचाई पर रूपकुंछ चमोली जिले के पूर्वी छोर पर है. यह नंदा जात के होमकुंड तक के रास्ते में त्रिशूल गिरि पिंड की गोद में है.
कितनी दूर: रूपकुंड जाने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा देहरादून का जोली ग्रांट यहां से करीब 195 किमी दूर है. नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋष‍िकेश यहां से 170 किमी दूर है. रूप कुंड जाने के लिए पर्यटक अली बुग्याल या बेदनी का रास्ता चुन सकते हैं. कहने की जरूरत नहीं कि बेदनी का रास्ता बेहद सुंदर और नाटकीय दृश्यों से भरा है.
क्‍यों जाएं: रूपकुंड में साल के ज्यादातर महीनों में बर्फ जमी रहती है. जब यह बर्फ पिघलती है तो यहां मानव और घोड़ों के कंकाल देखे जा सकते हैं. करीब 500-600 साल पहले यहां करीब 300 लोगों की मौत हो गई थी.

तपोवन:
जोशीमठ शहर की भीड़भाड़ से दूर तपोवन आराम करने की जगह है. यहां का शांत वातारण शहर के शोर-गुल से मुक्ति देता है. यह जगह अपने गर्म पानी के सोतों के लिए मशहूर है.
कितनी दूर: जोशीमठ शहर की भीड़ से करीब 15 किमी दूर है तपोवन से करीब 3 किमी की ट्रैकिंग करके पंच बद्री में से एक भविष्य बद्री पहुंचा जा सकता है.
क्‍यों जाएं: तपोवन में गर्म पानी के सोते हैं. इनका पानी हमेशा गर्म होता है और माना जाता है कि इस पानी में चमत्कारी औषधीय गुण हैं.

जोशीमठ:
जोशीमठ हिन्दू धर्म के लिए बहुत पवित्र जगहों में से एक है. जोशीमठ का पुराना नाम ज्योतिर्मठ है, जो भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग का स्थान है. शंकराचार्य ने यहां शक्ति पीठ को स्थापित किया था.
कितनी दूर: जोशीमठ की दूरी दिल्ली से करीब 490 किमी दूर है. ऋष‍िकेश से 250 किमी, देहरादून से 302, कोटद्वार से 280 और गोपोश्वर से 58 किमी दूर है जोशीमठ.
क्‍यों जाएं: यहां भगवान विष्णु के अवतार नरसिम्हा को समर्पित मंदिर है. कहा जाता है कि यहां स्थापित भगवान की मूर्ति का एक हाथ दिन-प्रतिदिन पतला हो रहा है और जिस दिन यह टूटकर गिर जाएगा, उस दिन भू-स्खलन के कारण बद्रीनाथ जाने का रास्ता पूरी तरह से बंद हो जाएगा.

कागभुसंडी ताल:
यह छोटी सी आयताकार झील चमकदार हरे पानी से भरी है. कनकुल पास के करीब कागभुसंडी ताल समुद्र तल से 5230 मीटर की ऊंचाई पर है और करीब 1 किमी लंबी है.
कितनी दूर: यह खूबसूरत ताल गोविंदघाट से करीब 37 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: कागभुसंडी ताल 6730 मीटर ऊंचे हाथी पर्वत की गोद में है. घांघरिया गांव के पास ही भियूंधार गांव से यहां पहुंचा जा सकता है और यहां पहुंचने के लिए विष्णु प्रयाग से भी रास्ता है. कर्णप्रयाग का रास्ता थोड़ा लम्बा जरूर है, लेकिन आसान है. जबकि भियूंधार की तरफ से जाने वाले रास्ते में घने जंगल हैं.

नंदा देवी राज जात:
नंदा देवी पर्वत आकाश छू लेने वाले पर्वतारोहियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है. इसके साथ ही स्थानीय निवासियों के लिए भी यह श्रद्धा और विश्वास का केंद्र रहा है. शायद यही कारण है कि नंदा देवी पर्वत को हिमालय का मोती भी कहा जाता है.
क्‍यों जाएं: उत्तराखंड की लोक परम्पराओं और कथाओं में नंदा को कहीं ध्याण यानी बेटी और कहीं मां के रूप में पूजा जाता है. गढ़वाल में नंदा देवी के मुख्य मंदिर लाता, कुरुड़, नौटी, कोटि, कांसुवा, भगौती, कुलसारी और कुमाऊं में नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, कोटभामरी, रणचूला सनेति प्रमुख हैं. नैनीताल, चमोली और अल्मोड़ा में नंदा देवी मेले तो यहां की समूची लोक सांस्कृतिक विरासत को समेट लाते हैं.
कब जाएं: नंदा देवी राज जात हर 12 साल बाद होती है. अगली बार यह 280 किमी की पद यात्रा 2026 में होगी. इसके अलावा हर साल छोटी यात्राएं आयोजित होती हैं.

कौरी पास:
कौरी पास में उत्तर दिशा की ओर मुंह करके खड़े हो जाएं तो पूर्व में त्रिशूल चोटी से लेकर पश्चिम में केदारनाथ तक केदारनाथ, चौखंबा, नीलकंठ, कामेट, गौरी पर्वत, हाथी पर्वत, नंदादेवी, बेथरतोली और दूनागिरी एक आश्चर्यजनक चंद्राकार बनाते हैं.
कितनी दूर: कौरी पास तक जाने के लिए चार रास्ते हैं. पर्यटक चाहें तो तपोवन से खुलारा होते हुए या जोशीमठ से औली-गोरसन-चितरकंठ या फिर जोशीमठ से मृग-तुगासी-खुलारा होते हुए यहां पहुंच सकते हैं. ये तीनों रास्ते गैलगढ़ में मिलते हैं जो कौरी पास के उत्तर में सिर्फ 5 किमी दूर है.
क्‍यों जाएं: औली और गोरसन बुग्याल का रास्ता बेहद आकर्षक है. प्रकृति प्रेमी इसी रास्ते से कौरी पास जाना पसंद करते हैं, लेकिन वापसी के तपोवन के रास्ते ही होती है. घाट का रास्ता ट्रैकिंग के दीवानों का पसंदीदा रास्ता है. यह पूरा रास्ता खूबसूरत फूल-पौंधों और वन्य जीवन से भरा पूरा है.
इतिहास: 1905 में लॉर्ड कर्जन ने कौरी पास तक का सफर तय किया था, इसलिए इस ट्रैक को कर्जन रोड कहा जाता है.