बागेश्वर और कौसानी के ये नजारे बुला रहे हैं

बागेश्‍वर जिला मुख्‍यालय होने के साथ ही धार्मिक नगरी भी है. बागेश्‍वर जिले में धार्मिक पर्यटन के लिए तो देश-विदेश से लोग आते ही हैं, इसके साथ ही यहां साहसिक पर्यटन (एडवेंचर टूरिज्‍म) के शौकीन भी डेरा डाले रहते हैं. कोई कौसानी और बागेश्‍वर की खूबसूरती से मोहित होकर यहां आता है तो किसी को पिंडारी ग्‍लेशियर का रोमांच बुला लाता है. इनके अलावा भी बागेश्‍वर जिले में कई ऐसी सैर-सपाटे की जगहें हैं जिनकी तरफ पर्यटक खिंचे चले आते हैं.

पिंडारी ग्‍लेश‍ियर:
कितनी दूर: यह विश्व प्रसिद्ध ग्लेशियर नंदा देवी और नंदा कोट पहाड़ों के बीच 3,353 मीटर (11,001 फीट) की ऊंचाई पर पिंडर घाटी में स्थित है. ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए इसे स्‍वर्ग कहा जा सकता है, क्‍योंकि हिमालय के तमाम ग्‍लेशियरों में यहां पहुंचना और ट्रेकिंग करना सबसे आसान है.
कितनी दूर: पिंडारी ग्‍लेशियर का आधार शिविर (बेस कैंप) जिला मुख्‍यालय बागेश्‍वर से सड़क मार्ग से 36 किमी, अल्‍मोड़ा से 109 किमी, काठगोदाम से 199 किमी है.
क्‍यों जाएं: एडवेंचर स्‍पोर्ट्स (ट्रेकिंग) के शौकीन लोगों के लिए यह स्‍वर्ग है. इसके अलावा लोग बर्फ और ग्‍लेशियर की खूबसूरती को कैमरे व आंखों में कैद करने के लिए भी यहां पहुंचते हैं.
ग्‍लेशियर की लंबाई: पिंडारी ग्‍लेशियर की लंबाई 5 किमी यानी 3.1 मील है.
ट्रेकिंग का रास्‍ता: पिंडारी ग्‍लेशियर का बेस कैंप सॉन्‍ग में है. यहां पहुंचने के बाद ट्रेकिंग के शौकीनों को 0 प्‍वाइंट तक 45 किमी यानी 28 मील की ट्रेकिंग करनी पड़ती है.
सॉन्‍ग से लोहारखेत – 3 किमी ट्रेक
लोहारखेत से धकुड़ी – 11 किमी ट्रेक
धाकुरी से खाती – 8 किमी ट्रेक
खाती से द्वाली – 11 किमी ट्रेक
द्वाली से फुरकिया – 7 किमी ट्रेक
फुरकिया से पिंडारी ग्लेशियर – 5 किमी ट्रेक

सुंदरढूंगा ग्लेशियर:
सुंदरढूंगा ग्लेशियर यानी सुंदर पत्‍थरों की घाटी भी पिंडर क्षेत्र में ही स्थित है. पिंडारी और कफिनी ग्‍लेशियर के मुकाबले सुंदरढूंगा की ट्रेकिंग करना खास कठिन है. ट्रेकिंग के शौकीनों और प्रकृति प्रेमियों के लिए यहां मैकतोली और सुखराम नाम के दो ग्‍लेशियर हैं. खाती गांव तक पिंडारी और सुंदरढूंगा दोनों ग्‍लेशियरों के लिए एक ही रास्‍ता है. इसके बाद दोनों के लिए रास्‍ते अलग-अलग हो जाते हैं.
कितनी दूर: सुंदरढूंगा ग्‍लेशियर का आधार शिविर (बेस कैंप) सॉन्‍ग है और यह जिला मुख्‍यालय बागेश्‍वर से सड़क मार्ग से 36 किमी, अल्‍मोड़ा से 109 किमी, काठगोदाम से 199 किमी है.
क्‍यों जाएं: एडवेंचर स्‍पोर्ट्स (ट्रेकिंग) के शौकीन लोगों के लिए यह स्‍वर्ग है. लेकिन ध्‍यान देने वाली बात यह है कि पिंडारी के मुकाबले सुंदरढूंगा में ट्रेकिंग ज्‍यादा मुश्‍किल है.
ट्रेकिंग का रास्‍ता: सुंदरढूंगा ग्‍लेशियर का बेस कैंप सॉन्‍ग में है. यहां पहुंचने के बाद ट्रेकिंग के शौकीनों को 0 प्‍वाइंट तक 54 किमी यानी 34 मील की ट्रेकिंग करनी पड़ती है.
सॉन्‍ग से लोहारखेत – 3 किमी ट्रेक
लोहारखेत से धकुड़ी – 11 किमी ट्रेक
धकुड़ी से खाती – 8 किमी ट्रेक
खाती से सुंदरढूंगा ग्लेशियर – 30 किमी ट्रेक

कफनी ग्‍लेशियर

बागेश्‍वर
बागेश्‍वर अब एक अलग जिला बन गया है. यह शहर अल्‍मोड़ा से करीब 90 किमी दूर सरयू और गोमती नदी के तट पर बसा है.
कितनी दूर: बागेश्वर अल्मोडा़ से 73 किमी, पिथौरागढ से 130 किमी और ग्वालदम से 50 किमी की दूरी पर स्थित है तथा मोटर मार्गों से जुडा हुआ है.
क्‍यों जाएं: बागेश्‍वर में सरयू गोमती व सुशप्त भागीरथी के पावन संगम तट पर भगवान शिव के प्राचीन बागनाथ मंदिर के पास हर साल जनवरी में उत्‍तरायणी मेले का आयोजन होता है.
इतिहास: बागेश्‍वर में शिव मंदिर का निर्माण 1602 में उस समय कुमाऊं के राजा लक्ष्‍मी चंद ने करवाया था. हालांकि इतिहास की शुरुआत से ही इस जगह का अपना महत्‍व है.

कौसानी
कितनी दूर: कौसानी अल्‍मोड़ा से करीब 52 किमी की दूरी पर बसा है जबकि जिला मुख्‍यालय बागेश्वर से 42 किमी. व बैजनाथ से 16 किमी. दूर है कौसानी. यह मोटर मार्गों से अच्‍छी तरह से जुड़ा हुआ है.
क्‍यों जाएं: कौसानी हिमालय की चोटियों और ग्‍लेशियर के बेहद नजदीकी नजारों और हरियाली के लिए मशहूर है. कौसानी के सामने मशहूर कत्‍यूर घाटी फैली है और यहां से सूर्योदय और सूर्यास्‍त का अद्भुत नजारा दिखता है.
इतिहास: स्‍वतंत्रता आंदोलन के बीच 1929 में महात्‍मा गांधी ने भी यहां 14 दिन गुजारे थे. गांधी जी के यहां प्रवास की निशानी के रूप में यहां उनका अनाशक्‍ति आश्रम है. राष्‍ट्रपिता ने कौसानी को भारत का मिनी स्वीजरलैंड कहा जाता था.
कौसानी मशहूर कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्‍मस्‍थली भी है.

बैजनाथ
कितनी दूर: बैजनाथ कत्‍यूरी घाटी में कौसानी से करीब 19 किमी.  और जिला मुख्‍यालय बागेश्‍वर से 24 किमी दूर छोटा और प्राचीन शहर है. यह मोटर मार्ग से अच्‍छी तरह से जुड़ा हुआ है.
इतिहास: एक समय यह शहर कत्‍यूरी राजवंश के राजाओं की राजधानी हुआ करता था और उस समय इसे कार्तिकेयपुरा नाम से बुलाया जाता था.
क्‍यों जाएं: यहां गोमती नदी के तट पर पौराणिक धार्मिक आस्था के प्रतीक भगवान शिव के शिवालय है. बैजनाथ मंदिर माता पार्वती के प्राचीन और पत्‍थर की भव्‍य मूर्ति के लिए मशहूर है.

शिखर मंदिर:
कितनी दूर: शिखर मंदिर जिला मुख्यालय से 50 किमी. दूर भराडी से शामा मोटर मार्ग पर स्थित झोपडा नामक जगह से लगभग 6 किमी. पैदल दूरी पर स्थित है.
क्‍यों जाएं: भगवान मूल नारायण के नाम से शिखर मन्दिर आस्था का प्रतीक है.

पांडुस्‍थल
कितनी दूर और कैसे जाएं: जिला मुख्‍यालय से पांडुस्‍थल जाने के लिए हरसिल तक मोटर मार्ग उपलब्‍ध है. हरसिल से लगभग 20 किमी. की दूरी पैदल तय करके पांडुस्‍थल पहुंचा जा सकता है. हरसिला से कन्यालीकोट बैसानी, पौसारी, सुंगरखाल होकर यहां पहुंचा जा सकता है.
क्‍यों जाएं: पांडुस्थल कुमाऊं व गढ़वाल की सीमा पर स्थित है. यहां से हिमालय के प्राकृतिक नजारों का नजदीकी से लुत्‍फ लिया जा सकता है.