गंगा को साफ-सुथरी होने के लिए भगीरथ का इंतजार

हरिद्वार
पतित पावनी गंगा को निर्मल बनाने के लिए दशकों से कोशिश चल रही है. दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी कहिए या स्वार्थ की राजनीति, कि केंद्र सरकार की ओर से तमाम योजनाएं चलने के बावजूद इसकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हो पा रहा है. आज भी समाज का एक ऐसा वर्ग है, जिसकी अवहेलना करना पाप समझा जाता है. वह है पुरोहित वर्ग. ऐसे में पुरोहित ‘भगीरथ’ बनकर आएं तो गंगा की सफाई हो सकती है.

दुनिया भर में धर्मनगरी हरिद्वार की अपनी अलग पहचान है. देश दुनिया से लोग यहां अपने पापों के नाश, पुण्य प्राप्ति और अपने पितरों के तर्पण के लिए आते हैं. हर की पैड़ी सहित सभी घाटों पर हर रोज हजारों श्रद्धालु आते हैं और पूजा आदि के लिए तमाम तरह की चीजें साथ लाते हैं. पूजा अर्चना के बाद इन वस्तुओं को श्रद्धालु वहीं घाटों पर छोड़ देते हैं या नदी में प्रवाहित कर देते हैं. इसमें पॉलीथिन में बंधी पूजा सामग्री सहित पुराने वस्त्र आदि तक होते हैं. इसके अलावा भी तमाम अन्य तरह की गंदगी भी श्रद्धालु जाते-जाते घाटों पर फैला जाते हैं. अगर इन्हें रोक दिया जाए तो गंगा सफाई की बहुत बड़ी बाधा निपट जाएगी. इतना बड़ा काम कोई संस्था या सरकार नहीं कर सकती.

पुरोहित अगर इस पुण्य कार्य के पुरोधा बनें तो न केवल गंगा निर्मल होगी, बल्कि समाज में स्वच्छता का संस्कार भी प्रबल होगा. गोमुख से लेकर गंगा सागर तक लाखों पुरोहित गंगा किनारे अपने यजमानों के धार्मिक अनुष्ठान आदि कराते हैं. सभी पुरोहित व्यक्तिगत रूप से इस बात का संकल्प लें कि वे अपने यजमानों को गंगा और घाट दोनों में गंदगी नहीं करने देंगे तो यह संभव भी है और सहज भी.

आज भी भारतीय संस्कृति में पुरोहितों की अवमानना करना गलत समझा जाता है. इसमें भी शर्त यही है कि पुरोहितों को भी नाम चमकाने से ज्‍यादा अपने अंदर गंगा सेवा के भाव को पैदा करना होगा और अगर इसकी शुरुआत हरिद्वार से हो ये खुद में एक नजीर होगी.

पुरोहितों और श्री गंगा सभा की ओर से पुरोहितों को सार्वजनिक रूप से जागरुक किया जाता है. हर रोज गंगा आरती से पहले श्रद्धालुओं को इसकी शपथ दिलाई जाती है.